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प्रेम

प्रेम इस पृथ्वी पर मौजूद सभी जीव,वस्तु अथवा चीज़ का स्वभाव और खुशियों का प्रतीक है,दरअसल अगर हम स्पष्ट रूप में देखें तो इंसान प्रेम वश ही जन्म लेता है और इस तरह से पूरे विश्व में प्रेम के सिवाय कुछ नहीं है ,प्रेम का निचला स्तर ही ईर्ष्या,द्वेष,दुश्मनी का भाव इत्यादि है,चाहे कोई...

मेडिटेशन

अपनी चेतना को बाह्य क्रियाओं से हटाकर किसी एक विशेष स्थान पर इकट्ठा करना ही ध्यान लगाना है,मेडिटेशन का उल्लेख कई उपनिषद् में भी पाया जाता है,महर्षि पतंजलि के योगसूत्र में भी ध्यान का उल्लेख पाया जाता है।ध्यान दरअसल समय की पाबंदियों से परे ,स्वयं को उस अवस्था में लेे जाना है जहां पर...

विवेकानन्द के विचार

आधुनिक युग को एक महान दार्शनिक के रूप में एक इंसान मिला जिसे भारत में बेहद सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है ,भारत ही नहीं अपितु विश्व के कई कोनों में स्वामी विवेकानन्द की बातों का अनुसरण किया जाता है,आधुनिक युग में दार्शनिक विचारधारा को पुनर्जन्म देने का श्रेय विवेकानन्द को ही जाता...

जीवन का लक्ष्य : खुशियां

इस भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में इंसान जिस तरह धन दौलत के लिए भागता फिर रहा है उस से कहीं ना कहीं उसका ही स्वयं के समय नहीं निकल पाता जिसकी वजह से वो जीवन के परम आनंद से वंचित रह जाता है और आखिरकार अवसादग्रस्त हो जाता है,जिस से अपने आप ही तमाम...

आत्मज्ञान और सकारात्मकता

इंसान अपने जीवन काल में जो कुछ भी करता है वो कहीं ना कहीं ऊर्जा के स्रोत का इस्तेमाल ही होता है जो इंसान में गुप्त रूप से मौजूद होती है,जिसका स्वयं इंसान भी पता लगा पाने में असमर्थ होता है हालांकि ये ऊर्जा समय और परिस्थिति के मुताबिक़ इंसान को संबल प्रदान करती...

घर की सफ़ाई करने के टिप्स

कोरोना वायरस की वजह से आज पूरी दुनिया तबाह है और तरह तरह की योजनाएं बना रहा है जिस से इसका प्रकोप कम किया जा सके या रोकथाम किया जा सके,जितने भी विशेषज्ञ हैं वो सभी अपनी अपनी राय दे रहे हैं इससे बचाव के लिए,हालांकि अब विषय ये है कि घर में इसके...

आत्मविश्वास ही समाधान

इस संसार में अगर सबसे शक्तिशाली कोई चीज़ है तो वो आत्मविश्वास ही है,जिसकी मदद से इंसान बड़ा से बड़ा काम कर सकता है,नकारात्मकता से दूर हो सकता है और उस काम में विजय भी हासिल कर सकता है।हालांकि आत्मविश्वास व्यक्ति की परवरिश पर भी निर्भर करता है या व्यक्ति की छोटी छोटी सफलताओं...

कर्म

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥अर्थात् हमारा अधिकार कर्म करने का है,इसके फल की चिंता करने का नहीं,ऐसा करने से हम कर्म के शुभ अशुभ फल से मुक्त हो जाएंगे और योगी होकर ईश्वरत्व में मिल जाएंगे,  गीता के इस श्लोक से कर्म का परिचय देना श्रेयस्कर है।कर्म शब्द की उत्पत्ति...

खुशियां बांटिए अफवाहें नहीं

कोरोनावायरस से जूझते हुए अमूमन ३ माह से अधिक समय हो गया है, और अभी भी पता नहीं कब तक इस लड़ाई में हम जीत हासिल कर पाएंगे,अभी तक की योजना के मुताबिक़ सामाजिक दूरी ही कारगर उपाय है इस अजीब से वायरस के प्रकोप से बचने का,इसलिए ही लोग पिछले ३ माह से...

अनेकता में एकता

ऐक्यं बलं समाजस्या तदभावे स दुर्बलः ।तस्मात् ऐक्यं प्रशंसन्ति दृढं राश्त्र हितैषिणः ॥संस्कृत का ये श्लोक समाज में एकता की ज़रूरत को इंगित करता है जिसका वास्तविक मतलब है :किसी भी कामयाब समाज की मजबूती एकता से ही है,इसलिए अगर आप राष्ट्र की अच्छाई चाहते हैं तो एकता का मजबूती के साथ समर्थन करें।हमारे...