वैचारिक मतभेद

वैचारिक मतभेद

प्रत्येक इंसान अपने विचारों से पूर्ण जाना जाता है,विचारों की ही प्रौढता उस इंसान का व्यक्तित्व बताती है और उसे  सफल बनाने का काम करती है ,हम ये भी कह सकते हैं कि हम जिस से भी किसी प्रकार का संबंध स्थापित करते हैं उसकी एक महत्वपूर्ण वजह भी वैचारिक मध्यस्थता है,अगर हमारे विचार आपस में नहीं मिलते हैं तो हम उस संबंध को ज्यादा समय तक जी नहीं सकते।

विचारों का एक संबंध हमारे मुख से निकली बातों से भी है,और यही बातें किसी के भी सामने हमारे विचारों को प्रदर्शित करती हैं,एक महान कवि कबीर दास का एक दोहा है जिसमें उन्होंने वाणी की महत्ता को बताया है और कहा है कि:

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए,

औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय।

तात्पर्य,हमें अपनी बातों को इतने सलीके से बोलना चाहिए जिस से की हम स्वयं तो सुख की अनुभूति करें ही साथ ही साथ सुन ने वाला भी उसी प्रकार की शीतलता को महसूस करे।

आज अगर हम अपने आसपास देखें तो तमाम तरह के विचारों के बीच मतभेद को देखता हुए पाएंगे,कहीं ना कहीं ये मतभेद हमारी प्रौढता के ऊपर दाग़ है,यही नहीं वैचारिक मतभेद ही वैश्विक शान्ति को भी भंग कर सकता है।

हम सबकी मानसिकता भिन्न भिन्न होती है ऐसे में ये लाज़िमी है कि विचार भी अलग अलग ही होंगे,तो किसी भी तरह के तर्क में वैचारिक मतभेद होना भी कोई बहुत बड़ी बात नहीं है,लेकिन इस बीच सबसे ज़रूरी ये है कि हम इस मतभेद को कैसे ज्ञानवर्धक तर्क संगत में तब्दील कर सकें।

इस भिन्न विचार का सबसे बड़ा फायदा ये है कि हम आपस में काफी कुछ ज्ञान अर्जित कर सकते हैं और नए नए विचारों को समझ भी सकते हैं,तो इस से ये बात भी तय है कि इस वैचारिक मतभेद से  जीवन बहुत कुछ सीख भी सकते है अगर हम इसे सही तरीके से करें।

इसलिए विचारों को बहुत ही सजगता से हमें प्रकट करना चाहिए( उद्देश्य सफल होने के लिए) और विचारों के पीछे बहुत ही विनम्र वाणी का प्रयोग भी करना चाहिए क्योंकि हम किसी विरोधी विचारधारा को भी बड़े ही सलीके से   स्पष्ट तौर पर बिना किसी को चोट पहुंचाए प्रकट कर सकते हैं और उसके पीछे की अपनी बात को भी प्रकट कर सकते हैं।

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