विवेकानन्द के विचार

विवेकानन्द के विचार

आधुनिक युग को एक महान दार्शनिक के रूप में एक इंसान मिला जिसे भारत में बेहद सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है ,भारत ही नहीं अपितु विश्व के कई कोनों में स्वामी विवेकानन्द की बातों का अनुसरण किया जाता है,आधुनिक युग में दार्शनिक विचारधारा को पुनर्जन्म देने का श्रेय विवेकानन्द को ही जाता है और जिस तरह से उन्होंने इस विचारधारा का प्रचार प्रसार किया ,उस से वास्तव में मानव जाति का बहुत कल्याण हुआ और अभी भी उनके अनुयायियों द्वारा उनकी बातों का प्रसार किया जाता है।

स्वामी विवेकानन्द का जन्म १२ जनवरी १८६३ को हुए था और उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था,बचपन से ही उनकी माता के धार्मिक विचारों का प्रभाव नरेंद्रदत्त पर ऐसा पड़ा की नरेंद्र दत्त २५वर्ष की आयु में ही गृह त्याग कर सन्यासी का जीवन जीते हुए स्वामी विवेकानन्द कहलाए,स्वामी विवेकानन्द ने गुरु के तौर पर रामकृष्ण परमहंस को चुना और गुरु शिष्य परम्परा का जीवंत उदाहरण पेश किया,गुरु के प्रति श्रद्धा का भाव विवेकानन्द की छवि से झलकता था।

यही नहीं स्वामी विवेकानन्द ने जीवन को जीने के जो महत्वपूर्ण तरीक़े बताए हैं वो भी बेहद कारगर हैं और लोग इसे अपने जीवन में उतारते भी हैं,वेदांत दर्शन को श्रेष्ठ साबित करने के लिए विवेकानन्द का योगदान अतुलनीय रहा है,आत्मा के विषय में भी विवेकानन्द का विचार अद्वैतवाद को मान ने वाला प्रतीत होता है,उन्होंने यह भी कहा है कि स्वयं को जागृत करने वाली आराधना को ही ईश्वर सर्वश्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि स्वयं को जागृत करना ही ईश्वर के समीप जाने के समान है।

विवेकानन्द के विचार युवान में भी जोश भरने वाला होता है,इस विचार के ही फलस्वरूप इंसान सतत् अभ्यास और परिश्रम करने के लिए प्रेरित भी होता है।

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