मस्तिष्क के दो पहलू

मस्तिष्क के दो पहलू

हमारे शरीर की संरचना कुछ ऐसी है कि जहां कहीं भी(शरीर के अंदर) कोई सूचना को पहुंचाना हो तो मस्तिष्क तुरंत सक्रिय हो जाता है और उस सूचना को पहुंचाता है और इस प्रकार से हमारा शरीर हर तरह से मस्तिष्क के बनाए बंधन से बंधा हुआ है।

लेकिन ऊहापोह में इंसान हो जाता है, कि किसे चुने

अमूमन ऐसा होता है कि व्यक्ति सोचता है कि उसका दिल कुछ और कह रहा है और दिमाग कुछ और कह रहा है,ऐसे में वो किसकी सुने,लेकिन गहराई में अगर जाया जाए,तो मालूम चलेगा की दिल का काम तो केवल धड़कने से है,वो भला सोच कैसे सकता है।

तो सीधा सा शक दिमाग़ पर जाता है कि और बात भी बिल्कुल सही है,ये दिमाग़ ही है जो हमें दो तरह से सोचने पर मजबूर कर देता है और हमें ऐसा लगता है कि दिल सोच रहा है,लेकिन वास्तविकता इस से भिन्न है।

ये दिमाग़ ही है जो एक तरफ तो हमें करुणा,दया,दानशीलता से भरकर आदर्शवादी विचारधारा में संलिप्त करता है।

वहीं दूसरी तरफ यही दिमाग़ हमें वास्तविकता से जोड़ता है,और डिप्लोमेट बनाता है।

और इन्हीं दोनों विचारधाराओं के इर्द गिर्द हम अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

ऐसे में इस युग में जीने के लिए हमें एक सूक्ष्म और बिल्कुल सीधी रेखा ज़रूर खींचनी होगी जो दोनों सोच के बिल्कुल मध्य से होकर जाती हो,जिससे हम आदर्श विचारों पर भी अमल करें और वास्तविकता भी ना भूलें।

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