प्रेम

प्रेम

प्रेम इस पृथ्वी पर मौजूद सभी जीव,वस्तु अथवा चीज़ का स्वभाव और खुशियों का प्रतीक है,दरअसल अगर हम स्पष्ट रूप में देखें तो इंसान प्रेम वश ही जन्म लेता है और इस तरह से पूरे विश्व में प्रेम के सिवाय कुछ नहीं है ,प्रेम का निचला स्तर ही ईर्ष्या,द्वेष,दुश्मनी का भाव इत्यादि है,चाहे कोई भी व्यक्ति हो वो स्वयं से प्रेम ज़रूर करता है,यही नहीं प्रकृति का भी स्वयं से उतना ही प्रेम है जितना जीवों का स्वयं से है,उदाहरण के तौर पर अगर हम देखें सूरज और चांद का आसमान से प्रेम,पेड़ का अपने पत्तों से प्रेम,नदियों का मिट्टी से प्रेम ऐसे तमाम तथ्य हैं जिसके आधार पर हम पूर्ण रूप से कह सकते हैं कि प्रकृति भी प्रेम में ही रची बसी हुई है।

अब बात करते हैं इस समय के प्रेम प्रसंग के बारे में, हालांकि ऐसा कभी कभी देखा जाता है कि लोग प्रायः प्रेम और मोह को एक जैसा ही समझने की भूल करते हैं,महाभारत में बहुत ही समझदारी से इसकी व्याख्या की गई है:

प्रेम समर्पण का भाव मांगता है

प्रेम में किसी भी प्रकार की कोई बंदिश नहीं होती है,

वहीं मोह इससे ठीक विपरीत है,स्पष्ट तौर पर कहा जाए तो मोह एक प्रकार से क्षणिक प्रेम के बंदिश का नाम है,जिसमें आज़ादी का नाम मात्र भी अंश नहीं होता।

लेकिन आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां जो दिखता है वही बिकता है,ऐसे में प्रेम तो कभी पल भी नहीं सकता,मोह ही हो सकता है जो समय के साथ ख़त्म हो जाता है,और यही कारण भी है कि आज के समय में रिश्ते बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जा रहे हैं,रिश्तों की कोई एहमियत नहीं रह गई है।

प्रेम का प्रसंग हालांकि सदियों से चली आ रही है और देखने को भी मिलती है ,अगर हम त्रेता युग की बात करें तो श्री राम और माता सीता का प्रेम देखने को मिलता है,हम द्वापर युग की बात करें तो श्री कृष्ण और राधिका का प्रेम देखने को मिलता है,लेकिन ऐसा हम सिर्फ देखते हैं,इसे अपने जीवन में उतारने की कोशिश नहीं करते।

जीवन को अगर हमें खुशहाल बनाना है तो हमें प्रेम के रास्ते पर ही चलना चाहिए,क्योंकि ईश्वर की संरचना ही प्रेम प्रधान है।

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