अनेकता में एकता

अनेकता में एकता

ऐक्यं बलं समाजस्या तदभावे स दुर्बलः ।

तस्मात् ऐक्यं प्रशंसन्ति दृढं राश्त्र हितैषिणः ॥

संस्कृत का ये श्लोक समाज में एकता की ज़रूरत को इंगित करता है जिसका वास्तविक मतलब है :

किसी भी कामयाब समाज की मजबूती एकता से ही है,इसलिए अगर आप राष्ट्र की अच्छाई चाहते हैं तो एकता का मजबूती के साथ समर्थन करें।

हमारे धर्म ग्रंथ और तमाम महत्वपूर्ण किताबों में एकता का ज़िक्र है और हो भी क्यों ना,किसी भी कुटुंब,देश का यदि हम नामकरण कर रहे हैं तो कहीं ना कहीं ये एकता का ही तो प्रतीक है,हम एक पूरे समूह को एक बंध में बांध रहे हैं जिससे ये बंध सुख दुख में पूर्ण रूप से एक साथ ही निर्णय लेे और किसी भी समस्या का समाधान एक साथ मिलकर सूझ बूझ से करे।

बचपन में हम बहुत सी कहानी सीख के तौर पर पढ़ते हैं जिससे हमें प्रेरणा मिलती है कि अपने जीवन को कैसे जिया जाए,इसी क्रम में एक पाठ ये भी मिलता है कि अनेकता में ही एकता है,अर्थात् जब कई लोग एक काम को मिलकर करेंगे तो वो काम जल्दी और पूरी तरह हो जाएगा।

लेकिन जैसे जैसे उम्र की सीढ़ी पर हम चढ़ते हैं,हम इन सभी बातों पर पर्दा डालना शुरू कर देते हैं शायद इंसान आवश्यकता से अधिक महत्वाकांक्षी हो जाता है,और ‘ हम ‘ की जगह ‘ मैं ‘ की भावना आ जाती है, और यही भावना हमें अकेला छोड़ देती है और इसी कारण से एकता भंग हो जाती है,इसलिए हमें इन भावनाओं को मरने नहीं देना चाहिए।

अगर एक पहलू हम ये देखें कि इंसान अपनी मृत्यु के बाद एक ही जगह समा जाता है,तब ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता कि किसी को कोई श्रेष्ठ जगह मिले और किसी को निहायती घटिया,तो हमें इस बात को समझना चाहिए कि जब भगवान ही अंततोगत्वा हमें एकसाथ रखना चाहता है तो हम अलग अलग क्यों रहना चाहते हैं,जब सृष्टिकर्ता हमारे लिए ऐसी योजना बनाकर हमें भेजा है कि हम साथ रहें अथवा वसुधैव कुटुंबकम की पद्धति बनी रहे,तो हमें भी उनकी इस आज्ञा का निर्वहन करना चाहिए और आपस में तारतम्य रखना चाहिए,क्योंकि एक कुटुंब,समाज,राष्ट्र,विश्व तभी तभी विजेता कहलाएगा जब अनेकता में एकता को प्रमाणित कर देगा और सफलता की नई कहानी कहेगा।

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