अद्वैतवाद

अद्वैतवाद

वेदांत का वह सिद्धांत जिसमें जीव और ब्रम्ह को स्पष्ट तौर पर एक समान दिखाया गया है अर्थात् आत्मा और परमात्मा को एक ही माना गया है,इसी दर्शन को अद्वैतवाद कहते हैं,अद्वैतवाद सनातन धर्म के प्रभावशाली मतों में से एक है,अद्वैतवाद एक संस्कृत शब्द है जिसका मतलब एकत्ववाद से है अर्थात् दो ना होना।

आत्मा को लेकर दो विचारधाराएं व्याप्त हैं:

१. द्वैतवाद

२.अद्वैतवाद

द्वैतवाद का सीधा मतलब इस बात से है कि आत्मा और परमात्मा दोनों अलग अलग हैं इनमें भिन्नता है,नास्तिक विचारधारा बहुत हद तक इसपर निर्भर थी ,लेकिन मध्यकालीन दार्शनिक शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ के बाद आस्तिकता को जीवंत रखा और अद्वैतवाद की परम्परा का उद्धार किया और सफल दार्शनिक के रूप में भारत में अपना लोहा मनवाया।

अगर कई महान दार्शनिक की माने तो ईश्वर सभी के अंदर है ,अथवा जागृति सबमें है ,बस आवश्यकता है उस स्तर पर ध्यान केंद्रित करने की,कबीर दास से लेकर गौतम बुद्ध और स्वामी विवेकानंद तक सभी इसी मत को भारतवर्ष में प्रचार प्रसार करते देखे गए:

कबीर दास की माने तो

माेको कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में,

ना मैं मंदिर ना मैं मस्जिद ना काबे कैलाश में।’

इस दोहे से उन्होंने ये कहना चाहा है कि ईश्वर हम ही में है इसे कहीं भी और ढूंढने जाने की ज़रूरत नहीं है।

विवेकानन्द की माने तो

‘ प्रत्येक आत्मा एक अव्यक्त ब्रम्ह है ‘

गौतम बुद्ध के बारे में अगर पढ़ा जाए तो ये स्पष्ट होगा की वो जीवन के बारे में सबसे पूछते पूछते थक चुके थे और अंत में बिहार के गया में बोधी वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और वो ज्ञान उन्हें अपने अंतर्मन से ही मिली थी,गौतम बुद्ध को विश्व का सबसे बड़ा उपासक या शिष्य माना गया है,हालांकि अनात्मवाद को मानते हुए भी उनमें करुणा कूट कूट कर भरी हुई थी।

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