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जो गर मन में हो कुछ कर गुजरने की चाह तो कोई राह में आया पत्थर क्या पहाड़ भी आपको मंजिल तक जाने में रोक नहीं सकता। कई बार हम देखते हैं और सुनते हैं तो कई बार हम खुद भी कहते हैं , अरे मैं भी ऐसा कर लेता गर मेरे पास वो होता, मैं भी ये बन जाता गर मेरे पास ये होता। कोई अपंग होता है तो वो कहे न कहे हम ही बोल देते हैं कि देखो बेचारे के हाथ नहीं हैं इसलिए मजबूर है। शारीरिक हो या कोई और कमी गर मन में ठान लिया जाये अपने मकसद को पूरा करना तो कोई ताकत नहीं जो आपको रोक सके। जिन बातों पर हमारा वश नहीं हम उसे बदल नहीं सकते लेकिन जो है उसे ताकत बनाकर जिया तो जा सकता है।

इस एक कहानी से शायद आपको ये बात और अच्छे से समझ आएगी। एक महान संगीतकार थे जिनके पिता भी एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। उनके पिता उन्हें बेहतर से बेहतर तालीम संगीत के क्षेत्र में देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपने बेटे को 10वीं कक्षा के बाद ही आगे की संगीत शिक्षा के लिए शहर भेज दिया। इस बेटे ने भी संगीत को ही अपना जीवन बना लिया था और वो अपने हर संगीत को बहुत महीनों या कई बार साल भर बाद लोगों के सामने लाते थे क्योंकि उन्हें जो भी कांट छांट करनी होती थी वो अपनी तरफ से पूरी करते थे, और जब तक वो एक आदर्श न बन जाये तब तक उसे पूरा करने में जुटे रहते थे, और एक बार संगीत पूरा होने पर उसमें कोई हेर फेर नहीं करते थे क्योंकि वह पूरी तरह आदर्श होता था, इसी के चलते 30 की उम्र में उनके कान में समस्या होने लगी और 40 के होते होते सुनना बंद हो गया लेकिन संगीत उनके जेहन में बस चुका था और उन्होंने इस शारीरिक कमी को भी कमजोरी नहीं बननेे दिया और संगीत के क्षेत्र में असीम सफलता और नाम कमाया। ये कहानी है लुडविग वन बीथोवन की जो जर्मन के महान संगीतकार थे।

कोई भी कमजोरी तब तक आड़े नहीं आती जब तक आप उसको खुद पर हावी नहीं होने देते, और खुद को उसके नीचे दबा लेते हो तो ताकत भो कमजोरी बन जाती है।

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Aayush Poddar

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