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Father’s Day Special – मेरे पापा!

Happy Father's day




मातृ दिवस हो या पितृ दिवस, mothers day या fathers day ये दिवस भारत की परंपरा का हिस्सा कभी नहीं थे लेकिन आज ये पूरे विश्व में मनाया जाने वाला त्योहार सा बन गए हैं।
क्यों मनाते हैं Father’s day?
क्या भूमिका है एक पिता की हमारे जीवन में?
इन्हीं बातों पर आज गंभीरता से मनन करने का प्रयत्न आज के लेख में करने जा रही हूँ।
पिता का नाम आते ही एक ओर जहाँ शख्त, अनुशासित और गंभीर इंसान की छवि दिमाग में उभर कर आती है वहीं दूसरी और एक दोस्त, प्रेरक, रक्षक की छवि भी साफ नजर आने लगती है। जहाँ माँ अपने बच्चों को प्रेम, करुणा और अच्छे संस्कारों से सींचती है वहीं दूसरी ओर एक पिता अपने संतान का हर तरह से रक्षा करने को प्रतिबद्ध होता है। लालन पोषण की सारी जिम्मेदारी एक पिता से अच्छा कौन कर सकता है? हालांकि आज के युग में माता पिता दोनों ही कामकाजी हो चुके हैं लेकिन दुनियादारी की समझ आज भी पिता में कहीं ज्यादा देखने को मिलती है और इसका कारण ये नहीं है कि  ये समाज पुरुष प्रधान है बल्कि यह है कि जो ठोकरे पिता ने खाई होती हैं वो माँ ने कम ही अनुभव की होती हैं। क्योंकि लड़की को घर में प्रेम और देखभाल लड़के की अपेक्षा अधिक मिलती ही है, चाहे आप इसे किसी भी संदर्भ में लें। माँ का कोई स्थान नहीं ले सकता तो पिता की तरह ढाल भी कोई और नहीं बन सकता।
father's Day-Daily Suvichar
पिता कठोर होते हैं लेकिन वो इसलिए ताकि अपनी संतान को श्रेष्ठ बना सकें, उन्हें गलत दिशा में भटकने से रोक सकें। पिता बिल्कुल एक बरगद के वृक्ष के समान होते हैं, जिनकी छांव में नन्हें पौधे बड़े होते हैं और सुरक्षित भी।




माता पिता के सानी इस दुनिया में कोई और नहीं हो सकता, इसीलिए इन्हें देवता की उपाधि से अलंकरित किया गया है।

मातृ देवो भव:, पितृ देवो भव:।।

आज हम पहले तो ये जानेंगे कि ये पितृ दिवस या father’s day क्यों मनाते हैं?
Father’s day की शुरुआत बीसवीं सदी के प्रारंभ में पिताधर्म तथा पुरुषों द्वारा परवरिश का सम्मान करने के लिये मातृ – दिवस के पूरक उत्सव के रूप में हुई। यह हमारे पूर्वजों की स्मृति और उनके सम्मान में भी मनाया जाता है। Father’s day को विश्व में विभिन तारीखों पर मनाते हैं, जिसमें उपहार देना, पिता के लिये विशेष भोज एवं पारिवारिक गतिविधियाँ शामिल हैं। वास्तव में Father’s day सबसे पहले पश्चिम वर्जीनिया के फेयरमोंट में 5 जुलाई 1908 को मनाया गया था। कई महीने पहले 6 दिसम्बर 1907 को मोनोंगाह, पश्चिम वर्जीनिया में एक खान दुर्घटना में मारे गए 210 पिताओं के सम्मान में इस विशेष दिवस का आयोजन श्रीमती ग्रेस गोल्डन क्लेटन ने किया था। प्रथम Father’s day चर्च आज भी सेन्ट्रल यूनाइटेड मेथोडिस्ट चर्च के नाम से फेयरमोंट में मौजूद है।
प्रथम Father’s day स्पोकाने, वाशिंगटन के सोनोरा स्मार्ट डोड के प्रयासों से दो वर्ष बाद 19 जून 1910 को आयोजित किया गया था। 1909 में स्पोकाने के सेंट्रल मेथोडिस्ट एपिस्कोपल चर्च के बिशप द्वारा हाल ही में मान्यता प्राप्त मदर्स डे पर दिए गए एक धर्मउपदेश को सुनने के बाद, डोड को लगा कि पिताधर्म को भी अवश्य मान्यता मिलनी चाहिए। वे अपने पिता विलियम स्मार्ट जैसे अन्य पिताओं के सम्मान में उत्सव आयोजित करना चाहती थीं, जो एक सेवानिवृत्त सैनिक थे तथा जिन्होंने छठे बच्चे के जन्म के समय, जब सोनोरा 16 वर्ष की थी, अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपने परिवार की अकेले परवरिश की थी।
अगले वर्ष नौक्स प्रेस्बिटेरियन चर्च के पादरी डॉ कोनराड ब्लुह्म की सहायता से सोनोरा इस विचार को स्पोकाने वायएमसीए के पास ले गयी। स्पोकाने वायएमसीए तथा मिनिस्टीरियल अलायन्स ने डोड के इस विचार का समर्थन किया और 1910 में प्रथम Father’s day मना कर इसका प्रचार किया। सोनोरा ने सुझाव दिया कि उनके पिता का जन्मदिन, 5 जून को सभी पिताओं के सम्मान के लिये तय कर दिया जाये। चूंकि पादरी इसकी तैयारी के लिए कुछ और वक़्त चाहते थे इसलिये 19 जून 1910 को वायएमसीए के युवा सदस्य गुलाब का फूल लगा कर चर्च गये, लाल गुलाब जीवित पिता के सम्मान में और सफेद गुलाब मृतक पिता के सम्मान में। डोड घोड़ा-गाड़ी में बैठकर पूरे शहर में घूमीं और बीमारी के कारण घरों में रह गये पिताओं को उपहार बांटे।
इसे आधिकारिक छुट्टी बनाने में कई साल लग गए।
छुट्टी को राष्ट्रीय मान्यता देने के लिये सन् 1913 में एक बिल कांग्रेस में पेश किया गया।सन 1916 में, राष्ट्रपति वुडरो विल्सन एक Father’s day समारोह में भाषण देने स्पोकाने गये तो वे इसे आधिकारिक बनाना चाहते थे किंतु इसके व्यावसायीकरण के डर से काँग्रेस ने इसका विरोध किया। अमेरिकी राष्ट्रपति कैल्विन ने 1924 में सिफारिश की कि यह दिवस पूरे राष्ट्र द्वारा मनाया जाये किंतु इसकी राष्ट्रीय घोषणा को रोक दिया। इस छुट्टी को औपचारिक मान्यता दिलाने के दो प्रयासों को काँग्रेस ठुकरा चुकी थी।1957 में, मेन सीनेटर मार्ग्रेट चेज स्मिथ ने काँग्रेस पर माता-पिता में से पिता को अकेला छोड़ कर, सिर्फ माताओं का सम्मान करके 40 साल तक पिता की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए एक प्रस्ताव लिखा। 1966 में, राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने प्रथम राष्ट्रपतीय घोषणा जारी कर जून महीने के तीसरे रविवार को पिताओं के सम्मान में, Father’s day के रूप में तय किया। छह साल बाद 1972 में वह दिन आया जब राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन  ने इस कानून पर हस्ताक्षर किये और यह एक स्थायी राष्ट्रीय छुट्टी बना।
Father’s day पिताओं के सम्मान में एक व्यापक रूप से मनाया जाने वाला पर्व बन चुका है, जिसमें पितृत्व, पितृत्व-बंधन तथा समाज में पिताओं के प्रभाव को समारोह पूर्वक मनाया जाता है। अनेक देशों में इसे जून के तीसरे रविवार, तथा बाकी देशों में अन्य दिन मनाया जाता है।
हमारा भारत उन सभी देशों से महान है जहाँ माता – पिता का दर्जा ईश्वर के समान होता है। यहाँ आज भी हिन्दू परिवारों में देखने को मिलेगा की सुबह बच्चे अपने माता पिता के चरण को स्पर्श करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। हिन्दू संस्कृति में यह बात आम है। इसीलिए माता को सभी तीर्थों के समान और पिता को देवों के तुल्य माना गया है,

इसीलिए कहा भी गया है

“सर्वतीर्थमयी माता। सर्वदेवमयो पिता।।”

शिव पुराण में कहा गया है :-

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रक्रान्तिं च करोति यः। तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।।

 अर्थात 

“जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी-परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है।”

इससे सिद्ध होता है कि माता पिता की भक्ति के आगे सारी भक्ति व्यर्थ हैं।




मां दुनिया की अनोखी और अद्भुत देन है।वह अपने बच्चे को नौ महिने तक अपनी कोख में पाल-पोस कर उसे जन्म देने का नायाब काम करती है। अपना दूध पिलाकर उस नींव को सींचती और संवारती है। जैसा कि मां का स्थान दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण है। वैसे ही पिता का स्थान भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। एक कविता कहीं पढ़ी थी आज यहाँ बहुत सटीक बैठ रही है जो पिता के हमारे जीवन में भूमिका को स्पष्ट करती है:
पिता एक उम्मीद है, एक आस है
परिवार की हिम्मत और विश्वास है,
बाहर से सख्त अंदर से नर्म है
उसके दिल में दफन कई मर्म हैं।
पिता संघर्ष की आंधियों में हौसलों की दीवार है,
परेशानियों से लड़ने को दो धारी तलवार है,
बचपन में खुश करने वाला खिलौना है,
नींद लगे तो पेट पर सुलाने वाला बिछौना है।
Father love
पिता जिम्मेवारियों से लदी गाड़ी का सारथी है,
सबको बराबर का हक़ दिलाता यही एक महारथी है,
सपनों को पूरा करने में लगने वाली जान है,
इसी से तो माँ और बच्चों की पहचान है।
पिता ज़मीर है, पिता जागीर है,
जिसके पास ये है, वह सबसे अमीर है,
कहने को सब ऊपर वाला देता है,
पर खुदा का ही एक रूप पिता का शरीर है।
 हम सभी सिर्फ एक दिन ‘father’s day’ मना कर इस दिन से इतिश्री नहीं कर सकते। माता-पिता ही दुनिया की सबसे गहरी छाया होते हैं, जिनके सहारे जीवन जीने का सौभाग्य हर किसी के बस में नहीं होता। इसलिए हमें अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर सिर्फ एक दिन ही उन्हें याद ना करते हुए प्रतिदिन उन्हें नमन कर अपना जीवन सार्थक बनाना चाहिए, क्योंकि माता और पिता दोनों की सहायता से ही जीवन की नैय्या चलती है, अकेले नहीं।।
उपहार दें, या कहीं घुमाने ले जाएं लेकिन इस एक दिन में ही पूरे वर्ष भर की कसर को पूरा करने का प्रयत्न न करें। पूरे वर्ष भर उन्हें आदर दें, सम्मान दें और फिर इस एक दिन उनके लिए जो विशेष आप करेंगे  तभी वो सुखदायी होगा आपके पिता के लिए।
Happy father’s day to all.

About the author

Nisha Shekhawat Adhikari

B.sc.(math)
MBA( HR & marketing)
She has participated in various functions as a speaker.
Content or blog writer by passion. She had written few blogs in DNA newspaper Jaipur and Some articles for college magazines.

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