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रमजान या रमदान क्या है? रोजा के नियम और महत्त्व

रमजान या रमदान क्या है? रोजा के नियम और महत्त्व
रमजान या रमदान इस्लामी कैलेंडर का 9वां महीना होता है, जिसे परम पवित्र माना जाता है। यह महीना कभी 29 तो कभी 30 दिन का होता है। और इस पूरे महीने उपवास रखा जाता है जिसे रोजा कहते हैं। उपवास को फ़ारसी में रोजा कहा जाता है और मुस्लिम समुदाय पर फ़ारसी प्रभाव ज्यादा है इसलिए सभी मुस्लिम वर्ग के लोग इस पवित्र महीने में रखे जाने वाले उपवास को रोजा ही कहते हैं। और उपवास को अरबी में सौम कहते हैं इसलिए अरबी में रमजान के महीने को  माह-ए-सियाम कहते हैं।रमजान के मास में कुछ शब्द आपको जरूर ही सुनने में आएंगे।

वो हैं:

1. रोजा, जिसकी हमने अभी बात की,
2. सहरी( सुबह के वक़्त कुछ खाया जाता है जिसे सहरी कहते हैं)
3. इफ्तार( पूरे दिन भर बिना कुछ खाये पिये रहने के बाद सूर्यास्त के पश्चात खाना खाया जाता है जिसे इफ्तार कहते हैं)।रमज़ान का मतलब होता है प्रखर। माना जाता है कि सन् 610 में लेयलत उल-कद्र के मौके पर मुहम्‍मद साहब को कुरान शरीफ के बारे में पता चला था। बस उसी समय से रमजान के इस माह को एक पवित्र महीने के तौर पर मनाया जाने लगा। रमज़ान के दौरान एक महीने तक रोज़े रखे जाते हैं और इस दौरान, बुरी आदतों से तौबा की जाती है।
नए चांद के साथ शुरू हुए रोजे 30 दिन बाद नए चांद के साथ ही खत्‍म होते है। यहाँ नए चांद से मतलब अमावस्या के बाद दिखने वाले चांद से होता है। और इसके दीदार बड़े मुश्किल होते हैं क्योंकि ये बहुत ही कम समय के लिए और बहुत हल्का दिखाई पड़ता है, इसीलिए कहावत भी है “ईद के चांद हैं आप तो”। मतलब जो कभी कभी ही दिखाई देता है और वो भी सभी नहीं देख पाते।
रमजान या रमदान का महीना बहुत ही पाक होता है और इसीलिए इसके नियम भी बेहद शख्ती से पालन किये जाते हैं, वरना रमदान या रमजान में रखे जाने वाले रोजे पूरे नहीं माने जाते। रमजान के मौके पर सभी स्वस्थ्य और बालिग लोगों के लिए रोजा रखना जरूरी बताया है। लेकिन बीमार, बूढ़े, सफर कर रहे लोगों, गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं के लिए छूट है। वे चाहे तो रख सकते हैं या नहीं भी रख सकते हैं। इसके अलावा मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के लिए रोजा रखना मना है। उनके लिए इसके बाद रोजा रखना चाहिए।

और कौन कौन से नियम हैं जो रोजा रखते समय ध्यान रखने होते हैं:-

रोजा के नियम और महत्त्व

– रोज़े का मतलब यह नहीं है कि आप खाएं तो कुछ न, लेकिन खाने के बारे में सोचते रहें। रोजे के दौरान खाने के बारे में सोचन भी नहीं चाहिए।
– इस्लाम के अनुसार पांच बातें करने पर रोज़ा टूटा हुआ माना जाता है।
ये पांच बातें हैं- बदनामी करना, लालच करना, पीठ पीछे बुराई करना, झूठ बोलना और झूठी कसम खाना।
– रोजे का मतलब बस उस अल्लाह के नाम पर भूखे-प्यासे रहना ही नहीं है। इस दौरान आंख, कान और जीभ का भी रोज़ा रखा जाता है। इस बात का मतलब यह है कि, न ही तो इस दौरान कुछ बुरा देखें, न बुरा सुनें और न ही बुरा बोलें।
– रोजे का मुख्य नियम यह है कि रोजा रखने वाला मुसलमान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के दौरान कुछ भी न खाए।
– रोजे के दौरान मन से और तन से दोनों तरह पवित्र रहने की हिदायत दी जाती है।
– सहरी, रोजे का अहम हिस्सा है। सहरी का मतलब होता है सुबह। रोजे का नियम है कि सूरज निकलने से पहले ही उठकर रोज़दार खाना-पीना करें। सूरज उगने के बाद रोजदार सहरी नहीं ले सकते।
– सहरी की ही तरह रोजे का दूसरा अहम हिस्सा है इफ्तार। सहरी के बाद सूर्यास्त तक कुछ भी खाने-पीने की मनाही होती है। सूरज अस्त हो जाने के बाद रोजा खोला जाता है, जिसे इफ्तार कहते हैं।
– रमजान के दौरान मन को भी शुद्ध रखना होता है। मन में किसी के लिए बुरे ख्याल नहीं लाने होते और पांच बार की नमाज़ और कुरान पढ़ी जाती है।
– मुसलमानों के लिए जकात देना बेहद अहम माना गया है। इसे प्रत्येक का फर्ज कहा गया है। जकात का मतलब वह पैसा जो आपने अपनी कमाई से निकाला है और खुदा के लिए समर्पित किया है। इसका उपयोग समाज के गरीब तबके की भलाई के लिए किया जाता है।
– माना जाता है कि यह जकात पवित्र माह के बीच में ही देना चाहिए ताकि ईद तक यह पैसा गरीबों तक पहुंच जाए। गरीब लोग भी ईद की खुशियां मना सकें।
– जो पांच बातें मानता है वह है इस्लाम।
यह अरबी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ हुक्म मानना है। जो ईमान, 5 वक्त की नमाज, रोजा रखना, जकात (दान)और हज करता है, वह इस्लाम का मतलब जानता है। इसलिए रमजान के महीने में इन पांचों बातों का विशेष ध्यान रखना होता है।
– रोजा रखने से दिल और रूह की सफाई हो जाती है। जिस तरह इंसान बदन, कपड़ें, खाने-पीने के बर्तनों आदि की सफाई करता है, उसी प्रकार शरीर के भीतर पेट और आंतों की सफाई के लिए भी रोजा जरूरी बताया गया है।
– मान्यता है कि रमजान के महीने में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और जो रोजे रखता है उसे ही जन्नत नसीब होती है।
– पैंगम्बर इस्लाम के मुताबिक रमजान महीने का पहला अशरा (दस दिन) रहमत का, दूसरा अशरा मगफिरत ( गुनाह)और तीसरा अशरा दोजख( नरक) से आजादी दिलाने का है।
– इस दौरान शराब, सिगरेट, तंबाकू और नशीली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
– रोजाा का मतलब बंदिश है ,सिर्फ खाने पीने की बंदिश नहीं है बल्कि हर उस बुराई से दूर रहने की बंदिश है जो इस्लाम में मना है।

क्यों मनाया जाता है रमजान या रमदान का महीना?

रमजान का महीना बड़ा ही पावन होता है। भूखा प्यासा रहना ही इसका मकसद नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि आप भूख का अहसास करें और उन भूखों को भोजन कराएं जिनको दो वक्त का खाना नसीब नहीं हो पाता। ये रमदान का महीना दिलों में सौहार्द, प्रेम और करुणा को बढ़ाता है। किसी ने कहा भी है, “घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।”
मतलब ये कि अल्लाह को पाना है तो उसके बंदों को खुश रखो। बच्चे अल्लाह का रूप होते हैं और एक बच्चे को खुश किया तो एक दिन का रोजा सफल हुआ। किसी गरीब को खाना खिलाया तो मानो रोजा पूरा हुआ। मोहम्मद साहब ने कहा है कि गलत काम करने वालों को जिंदगी में सिर्फ भूख और प्यास मिलती है। इसलिए रोजे में हम अपनी बुरी आदतों पर काबू करके अच्छे आचार-विचार ग्रहण किये जाते हैं।
इस्लाम धर्म में अच्छा इंसान बनने के लिए पहले मुसलमान बनना आवश्यक है और मुसलमान बनने के लिए बुनियादी पांच कर्तव्यों का अमल में लाना आवश्यक है। पहला ईमान, दूसरा नमाज़, तीसरा रोज़ा, चौथा हज और पांचवा ज़कात।
इस्लाम के ये पांचों कर्तव्य इंसान से प्रेम, सहानुभूति, सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा देते हैं। रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से परहेज़ करना। रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है। इसी तरह यदि किसी जगह लोग किसी की बुराई कर रहे हैं तो रोज़ेदार के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा होना भी मना है।
जब मुसलमान रोज़ा रखता है, उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी पैदा होती है।रमज़ान में पुण्य के कामों का सबाव सत्तर गुना बढ़ा दिया जाता है। इसलिए भी जकात(दान) इस महीने में अदा की जाती है।
रोजा झूठ, हिंसा, बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसका अभ्यास पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे।
कुरआन में अल्लाह ने फरमाया कि “रोज़ा तुम्हारे ऊपर इसलिए फर्ज़ किया है, ताकि तुम खुदा से डरने वाले बनो और खुदा से डरने का मतलब यह है कि इंसान अपने अंदर विनम्रता तथा कोमलता पैदा करे।”

रमजान के महीने का महत्त्व:-

रमजान के महीने का महत्त्व!

बुराई से घिरी इस दुनिया में रमजान का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। हर तरफ झूठ, मक्कारी, अश्लीलता और यौनाचार का बोलबाला हो चुका है। ऐसे में मानव जाति को संयम और आत्मनियंत्रण का संदेश देने वाले रोजा का महत्त्व ओर भी बढ़ गया है। रोजा के दौरान झूठ बोलने, चुगली करने, किसी पर बुरी निगाह डालने, किसी की निंदा करने और हर छोटी से छोटी बुराई से दूर रहना अनिवार्य है। रोजा रखने का असल मकसद महज भूख-प्यास पर नियंत्रण रखना नहीं है बल्कि रोजा रखने का अर्थ आत्म संयम, नियंत्रण, अल्लाह के प्रति अकीदत और सही राह पर चलने के संकल्प और उस पर मुस्तैदी से अमल से है। साल में 11 महीने तक इंसान दुनियादारी के झंझावातों में फँसा रहता है लिहाजा अल्लाह ने रमजान का महीना आदर्श जीवनशैली के लिए तय किया है।
रमजान का उद्देश्य साधन सम्पन्न लोगों को भी भूख-प्यास का एहसास कराकर पूरी कौम को अल्लाह के करीब लाकर नेक राह पर डालना है। साथ ही यह पाक रमजान का महीना इंसान को अपने अंदर झाँकने और खुद का मूल्यांकन कर सुधार करने का मौका भी देता है।
रमजान का महीना इसलिए भी अहम है क्योंकि अल्लाह ने इसी माह में हिदायत की सबसे बड़ी किताब यानी कुरान शरीफ का दुनिया में अवतरण शुरू किया था।
रमजान लोगों में प्रेम और अल्लाह के प्रति  विश्वास को जगाने के लिए मनाया जाता है। साथ ही धार्मिक रिवाजों के जरिये लोगों को गलत कार्य से दूर रखा जाता है।साथ ही रमजान के पावन महीने में दान का विशेष महत्त्व होता है इसलिए इस महीने में जकात और फ़ितरी देने की भी रस्म होती है जो गरीब लोगों के लिए बहुत मददगार साबित होती है।
रमजान को बरकत का महीना भी कहते हैं। इसमें खुशियां एवं धन आता है और साथ ही एकता का भाव बढ़ता है और आपसी मन मुटाव और वैमनस्य की भावना खत्म होती है। रमजान भी बाकी सब त्यौहार की तरह एकता और प्रेम ही सिखाता है। हर धर्म हर मजहब में त्यौहार मनाने का ढंग अलग अलग है, समय अलग है लेकिन मकसद सभी का एक है और वो है इंसान में इंसानियत को कायम रखना, उनमें आपस में प्रेम और सौहार्द को बढ़ाना। धर्म के जरिये पुण्य को बढ़ाना और पाप को खत्म करना। रमजान हो या दीपावली, होली हो या लोहड़ी, क्रिसमस हो या फिर ईद सभी का मकसद नेकी को फैलाना है और खुशियां बढ़ाना है। सभी मुस्लिम भाइयों और बहिनों को रमजान के पावन महीने की ढेर सारी शुभकामनाएं।
मुबारक हो रमजान।।

About the author

Nisha Shekhawat Adhikari

B.sc.(math)
MBA( HR & marketing)
She has participated in various functions as a speaker.
Content or blog writer by passion. She had written few blogs in DNA newspaper Jaipur and Some articles for college magazines.

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