Devotion

भगवान हर जगह है | God is everywhere

भगवान हर जगह है|God is everywhere




आज हम एक ऐसे विषय पर विचार करेंगे जो नया तो बिल्कुल नहीं है लेकिन फिर भी जवाब क्या है ये समझना हमेशा मुश्किल और उलझनों भरा ही रहा है।

और वो सवाल है कि क्या भगवान / परमात्मा हर जगह हैं (Is God everywhere?)?

और नहीं तोफिर where is God?

कौनसी साधना से मिलेंगे हमें भगवान?

क्या हम जानते हैं भगवान को?

क्या होती है सच्ची आस्था?

इन्हीं सब प्रश्नों के जवाब खोजने की तलाश में आज हम यहाँ आपसे मुखातिब हुए हैं।

where is God?

भगवान कौन हैं? पहले ये जान लेना अतिआवश्यक है ताकि हम उसकी सर्वव्यापकता को ठीक से समझ सकें। भगवान/परमात्मा जो सृष्टि के कर्ता धर्ता हैं, पूरे ब्रह्मांड में वो ही समाए हैं। जिनकी सत्ता सृष्टि के कण कण में हैं, जिन्हें वेदों मेंनेति नेति कहा गया है अर्थात न इति न इति यानी जिसका कोई आदि, मध्य या अंत नहीं है, जो अनंत है, अखण्ड है, अनाप्त है,अजर है, अमर है, पूरी सृष्टि जिसमें समाई है, वही हैं भगवान, God, भगवान, परमात्मा, अल्लाह, रब।।

अब यहाँ गौर कीजिए, पूरी सृष्टि भगवान में समाई है, तो इसका मतलब कि भगवान कण कण में व्याप्त हैं? या कण कणभगवान के अस्तित्व का प्रतीक है? सम्पूर्ण ब्रह्मांड भगवान से है, भगवान ब्रह्मांड में नहीं। हम सब parmatma से हैं, हममें parmatma नहीं।

इस सृष्टि में जो कुछ भी जड़ और चेतन है सब परमपिता परमात्मा(parmatma) से उत्पन्न हुआ है। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुनको अपने दिव्य और विराट रूप के बारे में समझते हुए कहते हैं कि

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरं।

मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद दृष्टुमिच्छसि।।

मतलब, हे अर्जुन ! तुम इस सृष्टि में व्याप्त जिस भी चीज को मुझ में देखना चाहो , उसे तत्क्षण मेरे शरीर में देखो। तुम इससमय तथा भविष्य में जो भी देखना चाहते हो , उसको यह विश्वरूप दिखाने वाला है. यहाँ एक ही स्थान पर चर- अचर , सबकुछ है। इससे यह जाहिर होता है कि भगवान चाहे साकार की सत्ता धारण कर लेता है, लेकिन साकार होते हुए भी वह निराकार होता है।

किसी शायर ने लिखा है :-

जिधर देखता हूँ , उधर तूं हीं तूं है

कि हर शै पे जलवा तेरा हूबहू है|

“हूबहू”   शब्द से यह जाहिर होता है , बिलकुल जैसा। यानि के जैसा परमात्मा है उसका जलवा भी इस सृष्टि में वैसा ही है। भगवान की सत्ता सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है।



Divine

लेकिन इसका यह अर्थ निकालना कि भगवान कण कण में है, थोड़ा सा तर्कसंगत नहीं लगता। ये ठीक वैसे ही है जैसे एक प्रधानमंत्री अपने देश की सबसे बड़ी सत्ता है, सभी उसी अनुसार होता है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वो सबमें समाए हैं। हां हर कार्य में उनकी सहमति है, हर जगह उनकी सत्ता है। वैसे ही भगवान हर जगह के स्वामी हैं, उन्हीं की सत्ता हर जगह है लेकिन वो उनमें समाए हुए नहीं हो सकते।

अगर God is everywhere. सही बात है तो फिर उन्हें मंदिर, मस्जिद,गिरजाघर, गुरुद्वारे में क्यों ढूंढा जाता है? अगर भगवान आपमें, मुझमें भी हैं तो फिर क्यों इंसान ही इंसान की जान का दुश्मन है? क्या parmatma कातिल हो सकते हैं? या हत्या करने का ख्याल दिल में आने दे सकते हैं? अगर पेड़ में पत्तों में God हैं तो उन्हें कोई भी काट सकता है, तोड़ सकता है क्या? फिर क्यों कोई अपंग और लाचार है? क्यों कोई जानवर तो कोई  इंसान है? जब भगवान सभी में है तो सब एक जैसे होने चाहिए न?

देखिए इस तरह से कह कर सिर्फ हमें भ्रमित किया गया और डराया गया था ताकि हम अनजाने में भी कोई बुरा कार्य न करें। इंसान ही नहीं बल्कि जीव जंतु या प्रकृति को भी किसी भी तरह हानि न पहुँचाने पायें। इसीलिए हमने पेडों को भी पूजा, जीवों को भी देवताओं का वाहन माना और उन्हें पूज्नीय माना, लेकिन आज हुआ क्या हम बुरे से बुरा कृत्य करने से भी पीछे नहीं हटते। भगवान की सत्ता को हानि पहुँचाते हैं। अगर वहाँ भगवान मौजूद होते तो क्या हम ऐसे अपराध कर पाते?

लेकिन अब इसका विरोधाभास यह है कि फिर महात्मा, साधु सन्यासी या जो विभिन्न धर्मों के अवतार माने गए हैं, क्या उनमें भी भगवान नहीं थे। क्या बुद्ध, महावीर, पैगम्बर मोहम्मद ये सब parmatma के अंश नहीं थे? तो यहाँ एक और बात कही गईहै कि भगवान वहाँ निवास करते हैं जहाँ स्थान खाली हो। अब ये खाली स्थान का क्या मतलब हुआ, इसे हम एक छोटे से उदाहरण से समझेंगे।

एक बार एक सन्यासी घूमते फिरते एक दुकान पर पहुंचे। उस दुकान में छोटे बड़े कई डिब्बे थे। एक डिब्बे की और सन्यासी ने ईशारा करते हुए पूछा इसमें क्या है? दुकानदार ने जवाब दिया कि इसमें नमक है।

सन्यासी ने फिर दूसरे डिब्बे के और ईशारा किया और पूछा इसमें क्या है? दुकानदार ने फिर जवाब दिया और बताया इसमें हल्दी है। इस तरह सन्यासी ने एक एक डिब्बे के बारे में पूछा। आखिर में पीछे रखे एक डब्बे के बारे में सन्यासी ने पूछा तो दुकानदार ने कहा इसमें राम राम हैं।सन्यासी ने बड़े अचरच से पूछा कि ये कौनसी वस्तु का नाम तुमने राम रख लिया है? तब दुकानदार ने कहा कि महात्मन! बाकी सभी डिब्बों में कोई न कोई वस्तु डाली हुई है लेकिन यह डिब्बा खाली है। हम खाली को खाली नहीं कहते, उसे राम राम कहते हैं।

Khali dabbe mein Ram.

यही है हक़ीक़त खाली में राम रहते हैं, भरे हुए में उन्हें स्थान कहाँ? अर्थात काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या द्वेष, कपट से जब दिल भर जाए तो वहाँ भगवान कैसे समाएं? भगवान तो सिर्फ साफ सुथरे और सब बुराइयों से खाली मन में ही वास करते हैं। यहाँ देखिए एक तो जो निवास करने की बात कही है वह काफी गहराई में कही गई है। किसी का आपके दिल में वास होने का मतलब उसका आपमें विद्यमान होना नहीं होता, बल्कि उसकी याद आपके दिल में बसी होने से होता है। यही बात वेदों में भी कही गई और गीता में भी।

भगवान स्वयं गीता में कहते हैं कि मैं न जन्म लेता हूँ, न ही मरण को प्राप्त होता हूँ, न मेरा कोई आदि है, न मध्य, न अंत।।

न कोई आकार न कोई रूप, लेकिन फिर भी सबसे ज्यादा नूर उन्हीं में हैं। parmatma एक ज्योतिबिन्दु समान हैं, वो परमशक्ति, परमपिता हैं। वो एक प्रकाशपुंज हैं। और हम सब आत्माएं भी उसी प्रकाश की सन्तान हैं, हम आत्मा भी एक सूक्ष्म ज्योतिबिन्दु ही हैं, लेकिन हम जन्मों के फेर में घिरे होते हैं। और शरीरधारी होते हैं।

उन महान आत्माओं जिनने God के बताए मार्ग को समझ कर, लोगों को भी वह मार्ग बतलाया वे भगवान के अवतार कहलाये। अवतार का मतलब जो आत्मा भगवान ने स्वयं इस धरा पर धर्म की स्थापना के लिए भेजें। इसीलिए बुद्ध हो या महावीर हम उन्हें पूजते हैं। कई बार इंसान की भी पूजा होती है क्योंकि उसके कर्म दैवीय होते हैं। कर्मो की ही पूजा होती है बाकी तो सब निमित्त बनता है। इसीलिए साधु संन्यासी, धर्म गुरुओं की पूजा हमारे द्वारा की जाती है। लेकिन इन सबका मकसद होता है कि हम भगवान को पहचाने लेकिन हम उन्हें ही God समझ कर पूजने लगते हैं।

अब where is God का जवाब तो आप समझ गए होंगे कि parmatma की याद और उनका अस्तित्व हर जगह है लेकिन वो इन सबमें समाए नहीं हैं। कण कण, पत्ता पत्ता उनकी मर्जी से हैं लेकिन खुद parmatma इनमें नहीं हैं। अब हम संक्षेप में बात करते हैं कि सच्ची आस्था क्या है और कैसे करें भगवान की साधना?



परमात्मा का दर्शन आत्मा के नेत्र- “विवेक’’- से होता है। जिन मनीषियों और महात्माओं ने भगवान की अनुभूति और उसका दर्शन पाया है, उन्होंने अपने विवेक को प्रखर और पवित्र बनाने के लिए प्रयत्न किया है। संसार के दोष और कलेशों से अपने को मुक्त किया है। अपने मनोदर्पण को मलों से मुक्त करके ही वे उस परम ज्योति का प्रतिबिम्ब अपने अन्दर देख सके हैं।

उन भाग्यवान परमात्म जिज्ञासुओं ने ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट, आदि दोषों से दूर रह कर प्राणि-मात्र से प्रेम किया, उन्हें अपना ही अंश और अपना ही स्वरूप माना। ये सभी अवगुणों को जो दूर कर लेता है वही है सच्ची आस्था parmatma के लिए। और भगवान की बनाई उस पूरी दुनिया को अपना मानकर और इसमें रहने वाले प्रत्येक जीव को प्रेम से देखना ही है भगवान की सच्ची साधना।।

भगवान प्रेम का सागर हैं और यही प्रेम वो हम सबमें देखना चाहते हैं। वो परमपिता हैं, हम सभी के पिता और एक पिता को पूजा पाठ, फूल फल या प्रसाद नहीं चाहिए बल्कि उनके बताए मार्ग पर हम चलें, उनमें हमारी आस्था बिना किसी संदेह के हो, यही उस परमशक्ति का हमें संदेश है। पिता को अपने बच्चों से कोई भक्ति या साधना नहीं करवानी होती, बस वो चाहते हैं तो इतना कि हमारा उनमें अटूट विश्वास और आस्था बनी रहे और उनके दिखाए सही मार्ग पर हम सदैव चलते रहें।God is everywhere.

भगवान हर जगह महसूस किए है सकते हैं लेकिन उसके लिए ज्ञान चक्षु खुले होने चाहिए, वरना हमारी स्तिथि ठीक उस अंधे इंसान की तरह होती है जो सूर्य के उदय होने पर भी उसके प्रकाश से वंचित होता है और दोष सूर्य को देता है कि वो मुझे अपने दर्शन नहीं कराना चाहता। अब ये निर्णय आपको लेना है कि आप भगवान को कहाँ तलाशते हैं? उनकी सर्वव्यापकता को किस तरह से आंकते हैं? कण कण में भगवान हैं या कण कण भगवान से है? खुद विचार मंथन करें और अपने विचार हमसे बांटे।।

About the author

Nisha Shekhawat Adhikari

B.sc.(math)
MBA( HR & marketing)
She has participated in various functions as a speaker.
Content or blog writer by passion. She had written few blogs in DNA newspaper Jaipur and Some articles for college magazines.

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