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बुद्ध पूर्णिमा; परिचय, उपदेश और महत्त्व।।

563 ईसा पूर्व का समय था। उत्तरी भारत कई राजवंश और गणतंत्रों में बंटा था। इन्हीं में से एक था राजा शुद्धोदन का राजवंश। ये शाक्य जाति के चुने हुए मुखिया माने जाते थे। इनके राज्य का नाम था कपिलवस्तु।यह जगह आज के नेपाल के दक्षिणी सीमा के करीब स्थित है।
इन्हीं राजा शुद्धोदन और रानी महामाया की संतान थे सिद्धार्थ गौतम जो बाद में चल कर बुद्ध के नाम से जग विख्यात हुए।
सिद्धार्थ गौतम के जन्म से 10 महीने पहले उनकी माँ महामाया को एक विचित्र स्वप्न आया था। जिसमें उन्होंने देखा कि छः दांतो वाला हाथी तीन बार रानी की परिक्रमा कर पसली से उनके शरीर में प्रवेश करता है। यह क्या था, उसके लिए 10 महीने का इंतज़ार करना था सभी को। आखिर वो शुभ दिन भी आया जब रानी महामाया अपने मायके जाते हुए जब लुम्बिनीे वन से गुजर रही थीं तभी साल वृक्षों के बीचोंबीच रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। और ये शिशु गर्भ के रास्ते से नहीं बल्कि रानी की पसलियों से बाहर आया। ये कोई साधारण बालक नहीं था बल्कि ये बालक था महात्मा बुद्ध।।
पुत्र जन्म के सात दिन बाद ही रानी महामाया का देहांत हो जाता है और उनकी बहिन गौतमी ने रानी की मृत्यु के बाद उस शिशु को गोद ले लिया और उसका नाम रखा सिद्धार्थ। सिद्धार्थ मतलब जिसकी इच्छाएं पूरी होती हों।
और उनके जन्म की खबर मिलते ही मुनि असित राजदरबार पहुचंते हैं और नन्हें सिद्धार्थ को गोद में लेते हैं और कहते हैं, राजन ये बालक बुद्ध बनेगा। ये बुद्ध है और ये कहकर रो पड़ते हैं। राजा समझ नहीं पाते कि मुनि क्या कहना चाहते हैं। तब मुनि असित कहते हैं राजा ये बुद्ध बनेगा और मैं उस वक़्त तक जीवित नहीं रहूंगा इसलिए मेरे नयन से अश्रु बह रहे हैं। इस बालक की सिर्फ एक ही गति है और वो है इसका बुद्ध बनना। चाहे तुम इसे कितना भी संसार से और उसके दुःख से दूर रखने का प्रयत्न करो लेकिन यह बुद्ध ही बनेगा। कहते हैं राजा शुद्धोदन इस बात से चिंतित होकर काफी वर्षों तक राजकुमार सिद्धार्थ को महल में ही रहने का प्रबंध रखते हैं और उनका विवाह यशोधरा से 16 वर्ष की आयु में ही करा दिया ताकि सिद्धार्थ गृहस्थी में उलझ जाएं और सन्यासी बनने की और अग्रसर न हो सकें। लेकिन जो नियति में लिखा होता है उसे कोई बदल नहीं सकता। आखिर वह दिन भी आया जब राजकुमार ने वृद्ध और मृत शरीर भी देखा और वो देखते ही उनमें वैराग्य की भावना उत्पन्न हुई और वो सब कुछ छोड़ कर सत्य की खोज में निकल पड़े। उनके सन्यास लेने के निर्णय के कुछ दिन बाद ही उनकी पत्नी यशोधरा एक पुत्र को जन्म देती है, जिसकी खबर लेकर एक दासी राजकुमार सिद्धार्थ के पास जाती है, लेकिन सिद्धार्थ मन में ये विचार करते हैं कि ये पुत्र राहु है, ये नया बंधन जन्मा है, इस बंधन में नहीं फंसना है, और दासी से मात्र रानी और पुत्र की कुशलता पूछने के लिए कह देते हैं। इसी बालक का नाम राहुल पड़ा था।
इस प्रकार राजकुमार सिद्धार्थ बुद्ध बनने की और चल पड़ते हैं। कहते हैं कई वर्षों के बाद उन्हें गया में पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ और 35 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बने।
 ये तो हमने संक्षेप में बात की सिद्धार्थ गौतम से गौतम बुद्ध बनने के बारे में। अब हम बात करते हैं बुद्ध पूर्णिमा के बारे में।
वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा भी कहते हैं। यह गौतम बुद्ध की जयंती है और उनका निर्वाण दिवस भी। ( हालांकि कोई निश्चित प्रमाण दोनों के ही नहीं है), माना जाता है कि इसी दिन गौतम बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी।
गृहत्याग के पश्चात सिद्धार्थ सात वर्षों तक वन में भटकते रहे। यहाँ उन्होंने कठोर तप किया और अंततः वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई। तभी से यह दिन बुद्ध पूर्णिमा के तौर पर जाना और मनाया जाता है।
बुद्ध का जन्म इसी दिन माना जाता है इसीलिए बुद्ध पूर्णिमा को बुद्ध जयंती के नाम से भी जाना जाता है। बुद्ध जयंती पर बोध गया में बहुत ही उल्लास सबके दिलों में छाया होता है।

कैसे मनातेे हैं बुद्ध जयंती या बुद्ध पूर्णिमा को:-

कैसे मनातेे हैं बुद्ध जयंती या बुद्ध पूर्णिमा

– इस दिन बौद्ध घरों में दीपक जलाए जाते हैं और फूलों से घरों को सजाया जाता है।
– दुनियाभर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और प्रार्थनाएँ करते हैं।
– बोधिवृक्ष की पूजा की जाती है। उसकी शाखाओं पर हार व रंगीन पताकाएँ सजाई जाती हैं। जड़ों में दूध व सुगंधित पानी डाला जाता है। वृक्ष के आसपास दीपक जलाए जाते हैं।
– माना जाता  है इस दिन किए गए अच्छे कार्यों से पुण्य की प्राप्ति होती है।
– पक्षियों को पिंजरे से मुक्त कर खुले आकाश में छोड़ा जाता है।
– गरीबों को भोजन व वस्त्र दिए जाते हैं।
– दिल्ली संग्रहालय इस दिन बुद्ध की अस्थियों को बाहर निकालता है जिससे कि बौद्ध धर्मावलंबी वहाँ आकर प्रार्थना कर सकें।

महात्मा बुद्ध के उपदेश या संदेश:-

महात्मा बुद्ध

बुद्ध कहते थे कि हर किसी को अपनी मुक्ति का रास्ता स्वयं तलाशना होगा, कोई देव नहीं, कोई ईश्वर नहीं, कोई गुरु नहीं कोई बुद्ध नहीं, कोई तथागत नहीं। खुद आप अपनी मुक्ति का रास्ता खोजो।

गौतम बुद्ध के उपदेशों में से कुछ ये हैं:

– शुभ कर्म करो। अशुभ कर्म में सहयोग मत दो।कोई पाप कर्म न करो।
– यदि आदमी शुभ कर्म करे, तो इसे पुनः पुनः करना चाहिए। उसी में चित्त लगाना चाहिए। शुभ कर्मो का संचय सुखकर होता है।
– भलाई के बारे में यह मत सोचो कि मैं इसे प्राप्त नहीं कर सकूंगा। बूंद बूंद पानी करके घड़ा भर जाता है।इसी प्रकार थोडा-थोडा करके बुद्धिमान आदमी बहुत शुभ कर्म कर सकता है।
– जिस काम को करके आदमी को पछताना न पड़े और जिसके फल को वह आनंदित मन से भोग सके ,उस काम को करना ही अच्छा है।
– अच्छे आदमी को भी बुरे दिन देखने पड़ जाते है ,जब तक उसे अपने शुभ कर्मों का फल मिलना आरम्भ नहीं होता ; लेकिन जब उसे अपने शुभ कर्मों का फल मिलना आरम्भ होता है ,तब अच्छा आदमी अच्छे दिन देखता है।
– सदाचार की सुगंध चन्दन, तगर तथा मल्लिका, सबकी सुगंध से बढ़कर है। धूप और चन्दन की सुगंध कुछ ही दूर तक जाती है ,किन्तु शील( सदाचार)की सुगंध बहुत दूर तक जाती है।
– भूतकाल में मत उलझो, भविष्य के सपने मत देखो वर्तमान पर ध्यान दो, यही खुशी का रास्ता है।
– आपको क्रोध की सजा नहीं मिलती है बल्कि आपको क्रोध से सजा मिलती है।
– संदेह और शक की आदत से भयानक ओर कुछ नहीं होता। संदेह और शक लोगो को आपस में दूर करता है और मित्रता तुड़वाता है।
– दुनिया में तीन चीजों को कभी नहीं छिपा सकते – सूर्य चन्द्र और सत्य।
– मंजिल या लक्ष्य को पाने से अच्छा है यात्रा अच्छी हो। हजारों शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है जो शांति लाता हो।
– बुराई से बुराई को कभी ख़त्म नहीं किया जा सकता। बुराई हमेशा प्रेम को समाप्त कराती है।
– सत्य पर चलने वाला व्यक्ति सिर्फ दो ही गलतियां कर सकता है, या तो पूरा रास्ता तय नहीं करता या फिर शुरुवात ही नहीं करता।
– क्रोधित होने का मतलब है जलता हुआ कोयला किसी दूसरे पर फेंकना। जो सबसे पहले आप को जी जलाता है।
– एक जलते हुए दीपक से हजारों दीपकों को जला सकते हो फिर भी दीपक की रोशनी काम नहीं होती। उसी तरह खुशियां बांटने से बढती है कम नहीं होती।
– लोभ और तृष्णा के वशीभूत न हो, यही बौद्ध जीवन मार्ग है।
– किसी को क्लेश मत दो,किसी  से द्वेष मत रखो।
– क्रोध न करो,शत्रुता को भूल जाओ। अपने शत्रुओं को मैत्री से जीत लो ।

बुद्ध पूर्णिमा का महत्त्व:-

महात्मा बुद्ध

इस दिन का महत्त्व सिर्फ बौद्ध धर्म को मानने वालों के लिए ही नहीं अपितु समस्त मानव जाति के लिए है। सच, अहिंसा, प्रेम, सदाचार ही जीवन का आधार हैं। बुद्ध ने स्वयं को कभी ईश्वर या उनका अवतार नहीं कहा, बल्कि उन्होंने खुद को पहचाना और यही संदेश बाकी सबको भी दिया। उन्होंने कहा कि मेरी बातों को भी परखों, और तभी निर्णय करो कि मेरी बातें मानने योग्य हैं या नहीं। हम सब भी बुद्ध जैसे महान होंगे यदि हम उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करें। आज वैशाख पूर्णिमा का ये दिन इसीलिए इतना महान है क्योंकि इसे महान बनाया था गौतम बुद्ध ने। गौतम बुद्ध पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने दुनिया को ये बताया कि एक सार्वभौम असाम्प्रदायिक धारा के माध्यम से ही विश्व बंधुत्व की स्थापना की जा सकती है। उनका हमेशा एक विश्व और एक मानवता में विश्वास रहा। बुद्ध की नजर में एक ऐसा समाज श्रेष्ठ था जो बांटा नहीं जा सकता। जो भी विचारधारा मनुष्य और मनुष्य के बीच रेखा खींचती है वह गलत है।
बुद्ध ने कहा मेरे ज्ञान का उपयोग करो और आगे जाने का रास्ता स्वयं ढूंढो। मेरी सीख का उपयोग जरूरत हो उतना करो और आगे बढ़ो। अहिंसा, मध्यम मार्ग, धार्मिक कर्मकांड की जगह करूणा, दया, दो इंसानों के बीच जाति – धर्म, गरीबी – अमीरी की वजह से फर्क नहीं करना, ये कुछ ऐसी बातें थीं जो गौतम बुद्ध ने हमारी सोच में स्थापित की। महात्मा बुद्ध ने जूस तरह से इन बातों को आमजन में स्थापित किया, उसने पूरी दुनिया की सोच को हमेशा के लिए बदल दिया।
इसीलिए कहते हैं, “बुद्धम शरणम गच्छामि“।।

About the author

Nisha Shekhawat Adhikari

B.sc.(math)
MBA( HR & marketing)
She has participated in various functions as a speaker.
Content or blog writer by passion. She had written few blogs in DNA newspaper Jaipur and Some articles for college magazines.

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