Devotion

नास्तिक या आस्तिक, क्यू बट रहे है हम?

आस्तिक या नास्तिक

साधारण तौर पे आस्तिक का मतलब जो भगवान को मानता है उसकी पूजा करता है सभी तरह के धार्मिक कर्म कांड करता है और इसके विपरीत नास्तिक वो है जो न मंदिर जाता है न पूजा करता है न भगवान को मानता है।

अब आस्तिक भी दो तरह के नजर आते हैं, एक तो वो जो पूर्णतया खुद को परमशक्ति को सौंप चुके हैं या कहे पूरी तरह भगवान को समर्पित हो चुके हैं अर्थात जो काम, क्रोध, मोह, लोभ ,अहंकार इन सबसे ऊपर उठ चुका है और जिसके जीवन का लक्ष्य सिर्फ ईश्वर की आराधना और उनके बताये मार्ग पर चलना है।

 दूसरे आस्तिक आपके और मेरे जैसे जो कभी कभी मंदिर हो आते हैं , कोई भी मुसीबत आये तो कह पड़ते हैं हे प्रभु मेरा ये काम करवा दो 51 रुपये का प्रसाद चढ़ा दूंगा। कभी कभार पूजा पाठ कर लेते है या हर रोज भी कर लेते है, मन में कही न कही डर रहता है कही भगवान जी बुरा न मान जाएं। बस उसे जाने बगैर जो भी सुनते है देखते है वैसे ही करते है और राम नाम जपते हैं। बाकी छोड़ते कुछ नहीं न बुरी आदतें न अहंकार न गुस्सा आदि आदि।

 ऐसे ही नास्तिक भी कई तरह के होते हैं एक तो पक्के नास्तिक जो कहते हैं न भगवान हैं न कोई शक्ति जो है वो दिख रहा है जो न दिखे वो है ही नहीं। इसलिए जो करना है करो जैसे रहना है रहो। बस ये लोग मैं मैं की रट लगाते है और कोई से लेना देना नहीं।

दूसरे नास्तिक वो जो कभी कभी नास्तिक बन जाते है तो तो कभी जरुरत पड़ने पे चुपके से मंदिर भी हो आते हैं । दुसरो को कहते फिरते है कि नास्तिक हूँ भगवान को नहीं मानता। लेकिन जब कोई आपदा आती है तो भगवान ही नजर आते है हर जगह।

और तीसरे नास्तिक वो जो सही मायने में नास्तिक नहीं आस्तिक ही हैं बस झूठे आडम्बरो को नहीं मानते। खुद पे विश्वास करते हैं और ईश्वर को भी खुद में तलाशते हैं, हर बुराई से दूर रहते है और दुसरो को भी मदद करते हैं खुद को पहचानने में। इनका मानना है कि भगवान मंदिर मस्जिद में नही स्वयं में ही हैं। ये देखा जाये तो एक तरह से पक्के आस्तिक हैं। लेकिन कुछ ऐसा मानते मानते खुद को ही भगवान मान बैठते हैं।

 मेरे विचार से हर वो व्यक्ति आस्तिक है जो विश्वास रखता है स्वयं में और साथ ही में ब्रह्माण्ड में और उसके रचियता में। क्योकि सिर्फ ये कह देने मात्र से कि ईश्वर जैसे कोई शक्ति नहीं जो हु मैं हूँ जो शक्ति है मुझमे है और बाकी सब विज्ञान है तो उन्हें एक बात समझनी होगी कि अगर हर बात के पीछे विज्ञान है तो क्यों नहीं आज तक कोई बता सका कि सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ? मत तो बहुत सारे हैं लेकिन कोई ठोस प्रमाण के साथ और पूरे आत्मविश्वास के साथ क्यों नही बता पाया कि आखिर क्या रहस्य है मानव जीवन का! खैर कभी बता भी न पाए शायद! आजकल तो वैज्ञानिक भी मानाने लगे हैं कि एक सुप्रीम पावर है वो क्या है उसे वो जानके भी अंजान ही रहेगे वरना सब क्या कहेंगे कि वैज्ञानिक होके संत महात्मा जैसे बात करते हैं।
परमात्मा में विश्वास करने वाले भी उसे ठीक से जान नहीं पाते और न कोई कोशिश ही करता है बस मूर्ति रूप में उसे ध्यान करके हाथ जोड़के चल देते है अपने अपने काम पे। न कभी सोचा कि क्यों एक मूर्ति या मंदिर दिखते ही खुद ब खुद सर झुक जाता है! जो आस्तिक है वो आस्तिक बने रहे लेकिन साथ ही में ये भी जाने कि उनकी ये आस्तिकता या ईश्वर का मानना सही दिशा में है या सिर्फ दिखावे मात्र तक सिमित है।

और जो नास्तिक है बेशक वो नास्तिक बने रहे लेकिन सृष्टि और उसके रचयिता का जरूर पता लगाये। और पता लग जाये तो बाकी सबको भी अवगत कराये ताकि मानव जाति का कल्याण हो सके।

About the author

Nisha Shekhawat Adhikari

B.sc.(math)
MBA( HR & marketing)
She has participated in various functions as a speaker.
Content or blog writer by passion. She had written few blogs in DNA newspaper Jaipur and Some articles for college magazines.

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