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नजरिया बदलें!

नजरिया बदलें!

गुरु द्रोणाचार्य ने शिक्षा पूरी होने पर कौरव और पांडव वंश के राजकुमारों दुर्योधन और युधिष्ठिर को परीक्षा के लिए बुलाया। गुरु द्रोण ने युधिष्ठिर को एक बुरा और दुर्योधन को एक अच्छा व्यक्ति ढूंढकर लाने को कहा। दोनों राजुकमार गुरू की आज्ञानुसार चल दिए ऐसे व्यक्ति की खोज में। लेकिन सारा दिन खाली हाथ भटकने के बाद शाम को वापिस गुरुकुल आए। दुर्योधन बोला, गुरुजी मुझे तो कोई भी भला आदमी नहीं मिला, जिसे में आपके पास लाता। दूसरी ओर युधिष्ठिर ने कहा, गुरुदेव में सभी बुरे कहे जाने वाले आदमियों के पास गया।

 उनसे मिलकर मैंने पाया कि उनमें तो अनेक गुण हैं। मुझे कोई व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो पूरी तरह से बुरा हो। क्षमा कीजिए मैं आपके कार्य को नहीं कर पाया।

तब गुरु द्रोण ने कहा, ‘प्रत्येक मनुष्य में अच्छाई और बुराई का संगम है। न कोई पूर्ण है। न कोई संपूर्ण से अच्छा। सवाल हमारे नजरिए का है कि हम उसमें क्या देखते हैं।’

कितनी शिक्षाप्रद प्रसंग है ये! इस संसार में न कोई पूर्ण रूप से अच्छा है न ही पूरी तरह से बुरा। बुराई में भी अच्छाई मिल ही जाती है और लाख अच्छाई हो तो एक न एक बुराई साथ में मिल ही जाती है। अब दृष्टि हमारी है कि वो बुराई देखती है या अच्छाई। हालाँकि ये बात किसी अंजान के लिए नहीं कही जा सकती, राह चलते हम किसी को अच्छा या बुरा नहीं बता सकते। उसके लिए हमें व्यक्ति को जानना होगा, उससे बात करनी होगी। और कई बार तो जानने और पहचानने के बाद भी हम ये निर्णय नहीं कर पाते कि कौन अच्छा है और कौन बुरा? फिर भी लोग प्रयत्न करते जरूर रहते हैं। अच्छाई देखने वाले लोग अब संसार में बिरले ही बचे हैं, बाकी सब तो बुराईयां ही देखने में व्यस्त हैं। कोई पूर्ण नहीं है लेकिन ये अपूर्णता स्वयं में कम नजर आती है। जबकि हकीकत ये है कि मुझमें इतनी कमियां हैं कि किसी और की बुराई मैं कहाँ देख सकू? तभी तो ये दोहा लिखा गया है;

“बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोय, जो तन झांका अपना तो मो से बुरा न कोय”।

 खुद में झांके तो पता लगता है कि हममें कितनी खामियां हैं, दूसरों की कहाँ दिखती हैं फिर! और अगर नजरिया ऐसा हो जाये तो दूसरों में फिर अच्छाई ही दिखती हैं। बदला कुछ नहीं, ना आप ना दूसरा वो व्यक्ति जिसकी अच्छाई या बुराई आप देखने चले थे। बदला है तो सिर्फ नजरिया। आपने आत्म मंथन किया तो कमियां खुद में दिखी और बाकी सभी में दिखे गुण। और जब स्वयं को सर्वोपरी समझा तो पूरा जग दिखा अवगुणों से भरा। “सोच बदलें, नजरिया बदलेगा; नजरिया बदलें, जग बदलेगा।”

About the author

Nisha Shekhawat Adhikari

B.sc.(math)
MBA( HR & marketing)
She has participated in various functions as a speaker.
Content or blog writer by passion. She had written few blogs in DNA newspaper Jaipur and Some articles for college magazines.

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