Yoga

जानिए क्या है योग, types of yoga, pranayam yoga और yoga asanas!

जानिए क्या है योग!




आज के लेख में हम बात करेंगे yoga की। चर्चा के मुख्य विषय होंगे; yoga का परिचय, परिभाषा, types of yoga, pranayam(प्राणायाम) क्या है, yoga asanas क्या है, कितने तरह के yoga asanas होते हैं? आइए शुरू करते हैं yoga को जानने से।
भारत में yoga का मतलब शरीर, मन और आत्मा को साथ लाना होता है। जब ये तीनों एक साथ होते हैं, तो वो योग(yoga) कहलाता है। भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर तरह के yoga को आध्यात्म से जोड़ा जाता है, चाहे वो शारीरिक yoga asana  हों या फिर मन और आत्मा को साथ में लाने केे लिए ध्यान योग हो। yoga का मतलब ही होता है जोड़ना। अब ये आत्मा का आत्मा से भी हो सकता है और आत्मा का परमात्मा से भी। लेकिन जो श्रेष्ठ योग होता है वह आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है। yoga हमारे ऋषि मुनियों द्वारा दिया गया एक अनमोल उपहार है। यह एक प्राचीन चिकित्सीय पद्धति है, जो आपके सम्पूर्ण स्वास्थ्य को बनाने में सहायक है। yoga के अभ्यास से व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सुधरता है बसर्ते इसे सही तरीके से किया जाये। yoga का अभ्यास आपको आध्यात्म से भी जोड़ता है।कुछ लोग कहते हैं कि शरीर को तोडना मरोड़ना योग है, यह एक प्रकार की excercise है, किन्तु यह सत्य नहीं है। yoga के अंतर्गत कई चीज़े हैं जैसे भक्ति, कर्म, ध्यान आदि। यह आपको पुनर्यौवन प्रदान करने वाला आनंदमय उपहार है।
Yoga की खासियत यह है कि इसे करने के लिए आपको किसी भी साधन की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए इसे हर व्यक्ति कर सकता है, चाहे वो गरीब हो या धनवान। साथ ही इसे हर उम्र का व्यक्ति कर सकता है।बच्चे हो या बूढ़े, हर कोई yoga को करके इसके फायदों से लाभान्वित हो सकता है।

आज हम बात करेंगे yoga के कुछ उन पहलुओं की जो yoga के ही अंतर्गत आते हैं। पहले हम संक्षेप में बात करते हैं yoga की अलग अलग मतों के अनुसार परिभाषा की।

yogas

1. पातंजल योग दर्शन के अनुसार चित्त की वृतियों का निरोध(रोकना) ही yoga है।
2. सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरूप में (आत्मीय रूप)अवस्थित होना ही yoga है।
3.विष्णुपुराण के अनुसार जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है।
4. भगवद्गीता के अनुसार दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्दों में सर्वत्र समभाव रखना yoga है।कर्त्तव्य कर्म बन्धक न हो, इसलिए निष्काम भावना से अनुप्रेरित होकर कर्त्तव्य करने का कौशल yoga(योग)है। सरल भाषा में कहें तो फल की इच्छा के बिना कर्म करना yoga है।
5. आचार्य हरिभद्र के अनुसार मोक्ष से जोड़ने वाले सभी व्यवहार yoga हैं।
6. बौद्ध धर्म के अनुसार कुशल चित्त की एकाग्रता ही yoga है। यहाँ यह बात ध्यान योग्य है कि सिर्फ चित्त की एकाग्रता नहीं कहा गया है बल्कि कुशल चित्त की एकग्रता की बात कही है अर्थात चित्त यानी मन के एकाग्र होने के साथ साथ आवश्यक है कि मन शुद्ध भी हो।
ये कुछ परिभाषाएं थीं जो yoga को अर्थ देती हैं और साथ ही में इसे आध्यात्म के साथ भी जोड़ती हैं।

अब हम बात करेंगे योग के प्रकारों की मतलब Types of Yoga:-

शिवसंहिता और गोरक्षशतक के अनुसार योग(yoga) चार प्रकार(types) के बताए हैं और वो निम्न हैं:-
1.मंत्र योग (mantra yoga)
2.हठ योग (hath yoga)
3.लय योग (lay yoga)
4.राज योग (raj yoga)

आइए विस्तृत चर्चा कर जानते हैं इन yogas के बारे में।

1. पहला मंत्र योग (mantra yoga):-

समान्य अर्थ है- ‘मननात् त्रायते इति मंत्रः’ मन को त्राय पार कराने वाला मंत्र ही है। मंत्र योग का सम्बन्ध मन से है, मन की परिभाषा है, “जो मनन, चिन्तन करता है वही मन है”। मन की चंचलता का निरोध मंत्र के द्वारा करना मंत्र योग है।
मंत्र से ध्वनि तरंगें पैदा होती हैं, मंत्र शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डालता है। मंत्र में साधक जप का प्रयोग करता है मंत्र जप में तीन घटकों का काफी महत्त्व है वे हैं- उच्चारण, लय व ताल। तीनों का सही अनुपात मंत्र शक्ति को बढ़ा देता है।
मंत्र का चयन कर उसे पूर्ण भक्ति भाव से उच्चारण किया जाना चाहिए, बार बार दोहराना चाहिए और मंत्र बदलना नहीं चाहिए।
मंत्र योग (mantra yoga) को करने के लिए कुछ खास नियमों का ध्यान रखना होता है और वो इस प्रकार हैं:-
1. नियत समय- ( ब्रह्म मुहूर्त और गोधूलि वेला)
2. नियत स्थान – हर रोज एक ही स्थान पर बैठना। मंत्र योग के लिए आप प्रत्येक दिन स्थान नहीं बदल सकते, हर रोज एक तय नियत स्थान पर ही बैठें।
3. स्थिर आसन – पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन। ये वो आसन हैं जिनमें बार बार मुद्राएं बदलनी नहीं होती। इन आसन में ही स्थिर होकर मंत्र योग (mantra yoga) संभव है।
4. आसन अर्थात वो वस्तु जिस पर बैठ कर आप योग(yoga) करते हैं। जैसे कंबल, चटाई या अन्य कोई एयर साधन। लेकिन इस mantra yoga को करने के लिए आपके पास मृग चर्म (यहाँ किसी भी जीव की हत्या कर उसकी खाल से आसन बनाने की बात नहीं कही गई है), कुशासन या कंबल सफेद चादर से ढका हुआ होना चाहिए।
5. आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए।
6. शरीर की स्वच्छता का ध्यान रहे, स्नान आदि करके ही इस योग को करें।
7. ध्यान या yoga के लिए एक अलग से कमरा या स्थान हो जो किसी और काम में न आता हो। वहाँ केवल ध्यान ही किया जाए, कुछ ओर नहीं।
8. भोजन शुद्ध शाकाहारी हो;शाक, फल, कंदमूल, दूध, दही, घी में पका चावल, मिश्री और जौ।
9. मंत्र उच्चारण प्रतिदिन 108 से 1080 तक किया जाना चाहिए।

2. दूसरा योग है हठ yoga:-

हठ योग

इसका शाब्दिक अर्थ हठ पूर्वक किसी कार्य को किया जाना है। हठयोग शारीरिक और मानसिक विकास के लिए विश्व की प्राचीनतम प्रणाली है जिसका शताब्दियों से भारत के योगियों द्वारा अभ्यास किया गया है। हठयोग के आसन मानसिक प्रशांति, शारीरिक संतुलन और दिव्य प्रभाव के साथ प्रतिपादित होते हैं। इससे मेरुदंड लचीला बनता है तथा स्नायु संस्थान के स्वास्थ्‍य में वृद्धि होती है।
हठयोग के नियमित अभ्यास से आप अपना खोया हुआ स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्राप्त कर सकते हैं। आत्मा की गुप्त शक्तियों को उद्घाटित कर अपनी संकल्पशक्ति में वृद्धि कर सकते हैं और जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
 हठयोग को एक ऐसे yoga के रूप में जाना जाता है जिसमें हठ पूर्वक कुछ शारीरिक एवं मानसिक क्रियाएं की जाती हैं। ‘ह’ से पिंगला नाड़ी (दाहिनी नासिका,सूर्य स्वर) तथा ठ से इड़ा नाड़ी (बाईं नासिका, चन्द्रस्वर)। इड़ा ऋणात्मक या नकारात्मक ऊर्जा शक्ति एवं पिगंला धनात्मक या सकारात्मक ऊर्जा शक्ति का संतुलन। इन दोनों के बीच तीसरी नाड़ी सुषुम्ना है। इस प्रकार हठयोग वह क्रिया है जिसमें पिंगला और इड़ा नाड़ी के सहारे प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कराकर ब्रहमरन्ध्र में समाधिस्थ किया जाता है। इस प्रकार की प्राणायाम प्रक्रिया ही हठयोग है, जो कि सम्पूर्ण शरीर की जड़ता को सप्रयास दूर करता है प्राण की अधिकता नाड़ी चक्रों को सबल एवं चैतन्य युक्त बनाती है और व्यक्ति विभिन्न शारीरिक, बौद्धिक एवं आत्मिक शक्तियों का विकास करता है।
इड़ा नाडी हमारे शरीर की एक प्रमुख प्राणिक वाहिका है। यह प्राण के निष्क्रिय पहलू का प्रतीक है जो मनःशक्ति या चित्तशक्ति के रूप में अभिव्यक्त और अनुभूत होती है। पिंगला का सम्बन्ध शक्ति, तेजस्वी शक्ति या सक्रियता से है जो शारीरिक आयाम में प्राणशक्ति के रूप में अभिव्यक्त और अनुभूत होती है। इस प्रकार हठयोग का सम्बन्ध शरीर के प्राणों को नियंत्रण की साधना पद्धति से है। इस कारण हठयोग को वेदों में ‘प्राणयोग’ भी कहा गया है।
हठयोग(Hatha Yoga) में सम्मिलित  योगिक क्रियायें निम्न हैं:-
1.सूर्य नमस्कार: सूर्यदेव की आराधना कर सूर्य नमस्कार की सभी बारह स्थितियां प्रयोग में लाकर आप अपनी बुद्धि को तेज कर सकते हैं।सूर्या नमस्कार को करने से आपके सभी प्रकार के दृष्टि दोष दूर हो जाते हैं।
2.आसन: आपके स्वास्थ्य लाभ और शारीरिक समस्याओं से मुक्ति के लिए आप आसन करते हैं। इनके नियमित अभ्यास से शरीर मजबूत, हल्का और स्फूर्तिमय बन जाता है। शरीर से आलस्य, दूर भाग जाता है और मोटापा जैसे विकारों का समूल विनाश हो जाता है। हठयोग(Hatha Yoga)आसनों के अभ्यास से शरीर बहुत शक्तिशाली, तेजमय, हल्का और स्फूर्तिदायक बन जाता है।
3.ध्यानासन: ध्यान को केन्द्रित करने के लिए जिन आसन को किया जाता हैं उन्हें ध्यानासन कहा जाता है। कुछ दिनों तक नियमित अभ्यास से आप किसी भी आसन कोे दो या तीन घंटे तक भी आसानी से कर सकते हैं। शरीर की जीवनीय शक्तियों का संतुलन और सही तालमेल बनाने, मन को शांति तथा शरीर को आनंदमय बनाने के लिए ये आसन बहुत ही महत्त्वपूर्ण होते हैं।
4.मुद्रा: हठ योग में कुछ योग मुद्रा भी सम्मिलित हैं ये मुद्राए आपके मन को आत्मा के साथ जोडती हैं। इन मुद्रा में ध्यान लगाने से आपका मन स्थिर होता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
5.प्राणायाम: मन तथा इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण करने के लिए प्राणायाम महतवपूर्ण है।प्राणायाम करने से आपके शरीर की समस्त व्याधियां समूल नष्ट हो जाती हैं।
6. कुंडलिनी जागरण योग: शरीर की रहस्यमयी शक्तियों का जागरण और आपके जीवन में अलौकिक शक्तियों का समावेश करने की क्रिया को कुंडलिनी जागरण की संज्ञा दी जाती है।यधपि कुंडलिनी जागरण करना कठिन है परन्तु एक बार जाग्रत अवस्था प्राप्त करने के बाद आप को आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है और परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है।
ये बात हुई हठ योग (hatha yoga) की।

3. अब तीसरा योग है लय योग( lay yoga):-

लय योग ( lay yoga) या कुण्डलिनी योग का अर्थ है -चित्त का अपने स्वरूप में विलीन होना या चित्त की निरूद्ध अवस्था। साधक के चित्त में जब चलते, बैठते, सोते और भोजन करते समय हर समय ब्रह्म का ध्यान रहे, तो इसे लययोग कहते हैं।
योग(yoga) सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के मेरुदंड के नीचे एक ऊर्जा संग्रहित होती है जिसके जाग्रत होने पर स्वयंज्ञान की प्राप्ति होती है।ऊर्जा का यह रूप (क्वाईल या कुंडली) एक सांप के साढ़े तीन कुंडली (लपेटे हुए) मारकर बैठे हुए रूप से मिलती है।
इसके अनुसार ध्यान और आसन करने से, यह ऊर्जा मेरु के नीचे से होकर मस्तिष्क तक 7 चक्रों से होकर गुजरती है। इसीलिए इस yoga का दूसरा नाम कुंडलिनी yogaभी है।
ब्रह्मांड के मध्य स्थित है ब्रह्मलोक, हमारे ग्रहमंडल के बीच स्थित है सूर्यलोक, उसी तरह हमारे मस्तिष्क के मध्य में स्थित है ब्रह्मरंध। आंखें बंद कर अपना संपूर्ण ध्यान ब्रह्मरंध ( भृकुटि)पर केंद्रित करके ब्रह्म में लीन हो जाना ही लय yoga है।
इसे करने के लिए शांत स्थान पर सिद्धासन में बैठकर आंखें बंद कर ध्यान को मस्तिष्क के मध्य लगाएं। मस्तिष्क के मध्य नजर आ रहे अंधेरे को देखते रहें और आनंदित होकर सांसों के आवागमन को महसूस करें। पांच से दस मिनट तक ऐसा करें।
इस लय yoga ध्यान को निरंतर करते रहने से चित्त की चंचलता शांत होती है। सकारात्मक शक्ति बढ़ती है। इससे मस्तिष्क निरोगी, शक्तिशाली तथा निश्चिंत बनता है। सभी तरह की चिंता, थकान और तनाव से व्यक्ति दूर होता है।

4. चौथा yoga है राजयोग(rajyoga):-

अष्टांग योग

राजयोग सभी योगों का राजा कहलाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के yoga की कुछ न कुछ सामग्री अवश्य मिल जाती है। राजयोग में महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का वर्णन आता है। राजयोग का विषय चित्तवृत्तियों का निरोध करना है। महर्षि पतंजलि ने समाहित चित्त वालों के लिए अभ्यास और वैराग्य तथा विक्षिप्त चित्त वालों के लिए क्रियायोग का सहारा लेकर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाया है। इन साधनों का उपयोग करके साधक के क्लेशों का नाश होता है, चित्तप्रसन्न होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है और विवेकख्याति प्राप्त होती है।
जब तक मनुष्य के चित्त में विकार भरा रहता है और उसकी बुद्धि दूषित रहती है, तब तक तत्त्वज्ञान नहीं हो सकता। राजयोग के अन्तर्गत महर्षि पतंजलि ने अष्टांग को इस प्रकार बताया है-
“यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयः”
महर्षि पंतजलि ने आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की क्रिया को आठ भागों में बांट दिया है। यह सभी क्रिया अष्टांग योग के नाम से प्रसिद्ध है। और यही अंग इस उक्त श्लोक में वर्णित हैं। ये आठ अंग हैं:-
यम, नियम, आसन, pranayam(प्राणायाम), प्रत्याहार,धारणा, ध्यान और समाधि।
वर्तमान में yoga के तीन ही अंग ज्यादा प्रचलन में हैं:- पहला आसन, दूसरा  pranayam (प्राणायम) और तीसरा ध्यान।
क्योंकि ये तीनों प्रचलन में हैं तो हम इन दोनों के बारे में और जानने का प्रयास करेंगे। ध्यान के बारे में हमने मंत्र योग और  लय योग में जान लिया है। अब बात करते हैं pranayam और asanas की। तो पहले समझते हैं pranayam को।
Yoga के आठ अंगों में से एक है pranayam।
प्राणायाम = प्राण + आयाम
इसका का शाब्दिक अर्थ है – प्राण (श्वसन) को लम्बा करना। pranayam का अर्थ ‘श्वांस को नियंत्रित करना’ या कम करना है।
Pranayam प्राण अर्थात् साँस और आयाम मतलब दो साँसो में दूरी बढ़ाना। श्‍वास और नि:श्‍वास की गति को नियंत्रण कर रोकने व निकालने की क्रिया को कहा जाता है pranayam।
श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना pranayam के क्रम में आता है। श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। हम साँस लेते है तो सिर्फ़ हवा नहीं खीचते बल्कि उसके साथ ब्रह्माण्ड की सारी ऊर्जा को उसमें खींचते हैं। हम जो साँस फेफड़ों में खीचते हैं, वो सामान्य साँस नहीं रहती अपितु उसमें सारे ब्रह्माण्ड की ऊर्जा समायी रहती है। जो साँस आपके पूरे शरीर को चलाना जानती है, वो आपके शरीर को दुरुस्त करने की भी ताकत रखती है। pranayam गायत्री महामंत्र के उच्चारण के साथ किया जाना चाहिये।

Pranayam का yoga में एक बहुत ही विशेष महत्त्व है लेकिन उसके लिए कुछ सावधानियां रखनी बेहद जरूरी हैं। वो कौनसी सावधानियां हैं जो हमें ध्यान देनी होंगी:-

– सबसे पहले तीन बातों की आवश्यकता है, विश्वास, सत्यभावना, दृढ़ता।
– pranayam करने से पहले हमारा शरीर अन्दर से और बाहर से शुद्ध होना चाहिए।
– बैठने के लिए नीचे अर्थात भूमि पर आसन बिछाना चाहिए। बैठते समय हमारी रीढ़ की हड्डी सीधी होनी चाहिए।
– सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन किसी भी आसन में बैठें, मगर जिसमें आप अधिक देर बैठ सकते हैं, उसी आसन में बैठें।
– pranayam करते समय हमारे हाथों को ज्ञान या किसी अन्य मुद्रा में होना चाहिए।
– pranayam करते समय हमारे शरीर में कहीं भी किसी प्रकार का तनाव नहीं होना चाहिए, यदि तनाव में pranayam करेंगे तो उसका लाभ नहीं मिलेगा।
– pranayam करते समय अपनी शक्ति का आवश्यकता से अधिक प्रयोग ना करें। हर साँस का आना जाना बिलकुल आराम से होना चाहिए।
– जिन लोगो को उच्च रक्त-चाप की शिकायत है, उन्हें अपना रक्त-चाप साधारण होने के बाद धीमी गति से pranayam करना चाहिये।
– यदि शल्य चिकित्सा हुई हो तो, छः महीने बाद ही pranayam का धीरे धीरे अभ्यास करें।
– हर साँस के आने जाने के साथ मन ही मन में ओम् का जाप करने से आपको आध्यात्मिक एवं शारीरिक लाभ मिलेगा और pranayam का लाभ दुगुना होगा।
– साँसे लेते समय किसी एक चक्र पर ध्यान केंन्द्रित होना चाहिये नहीं तो मन कहीं भटक जायेगा, क्योंकि मन बहुत चंचल होता है।साँसे लेते समय मन ही मन भगवान से प्रार्थना करनी है कि “हमारे शरीर के सारे रोग शरीर से बाहर निकाल दें और हमारे शरीर में सारे ब्रह्मांड की ऊर्जा, ओज, तेजस्विता हमारे शरीर में डाल दें”।
– ऐसा नहीं है कि केवल बीमार लोगों को ही pranayam करना चाहिए, यदि बीमार नहीं भी हैं तो सदा निरोगी रहने की प्रार्थना के साथ pranayam करें।
अब बात आती है तीसरे मुख्य अष्टांग yoga की जो है asanas (आसन).
सुविधापूर्वक एक चित और स्थिर होकर बैठने को आसन कहा जाता है। आसन का शाब्दिक अर्थ, बैठना, बैठने का आधार, बैठने की विशेष प्रक्रिया है।
पातंजल योगदर्शन में विवृत्त अष्टांगयोग में आसन का स्थान तृतीय है। चित्त की स्थिरता, शरीर एवं उसके अंगों की दृढ़ता और कायिक सुख के लिए इस क्रिया का विधान मिलता है। और yoga करने की इन क्रियाओं व आसनों को yoga asanas कहते हैं।
विभिन्न ग्रंथों में आसन के लक्षण हैं – उच्च स्वास्थ्य की प्राप्ति, शरीर के अंगों की दृढ़ता, स्थिरता, सुख दायित्व आदि। पंतजलि ने स्थिरता और सुख को लक्षणों के रूप में माना है।
Yoga asanas का मुख्य उद्देश्य शरीर के मल का नाश करना है। शरीर से मल या दूषित विकारों के नष्ट हो जाने से शरीर व मन में स्थिरता का अविर्भाव होता है। शांति और स्वास्थ्य लाभ मिलता है। अत: शरीर के स्वस्थ रहने पर मन और आत्मा में संतोष मिलता है।
आसन एक वैज्ञानिक पद्धति है। yoga asanasऔर अन्य तरह की excercises में फर्क है। yoga asanas जहां हमारे शरीर की प्रकृति को बनाए रखते हैं वहीं अन्य तरह की excercises इसे बिगाड़ देते हैं।

अब सवाल उठता है कि asanas कितने तरह के होते हैं?

asanas कितने तरह के होते हैं?

संसार के समस्त जीव जन्तुओं के बराबर ही आसनों की संख्या बताई गई है। इसलिए इनको मुख्य 6 भागों में बांट कर बताया गया है।
1.पशु-पक्षी आसन : पहले प्रकार के वे आसन जो पशु-पक्षियों के उठने-बैठने, चलने-फिरने या उनकी आकृति के आधार पर बनाए गए हैं जैसे- वृश्चिक, भुंग, मयूर, शलभ, मत्स्य, गरुढ़, सिंह, बक, कुक्कुट, मकर, हंस, काक, मार्जाय आदि।
2.वस्तु आसन : दूसरी तरह के आसन जो विशेष वस्तुओं के अंतर्गत आते हैं जैसे- हल, धनुष, चक्र, वज्र, शिला, नौका आदि।
3.प्रकृति आसन : तीसरी तरह के आसन वनस्पति और वृक्षों आदि पर आधारित हैं जैसे- वृक्षासन, पद्मासन, लतासन, ताड़ासन, पर्वतासन आदि।
4.अंग आसन : चौथी तरह के आसन विशेष अंगों को पुष्ट करने वाले तथा अंगों के नाम से सं‍बंधित होते हैं-जैसे शीर्षासन, एकपाद ग्रीवासन, हस्तपादासन, सर्वांगासन, कंधरासन, कटि चक्रासन, पादांगुष्ठासन आदि।
5.योगी आसन : पांचवीं तरह के वे आसन हैं जो किसी योगी या भगवान के नाम पर आधारित हैं- जैसे महावीरासन, ध्रुवासन, मत्स्येंद्रासन, अर्धमत्स्येंद्रासन, हनुमानासन, भैरवासन आदि।
6.अन्य आसन : इसके अलावा कुछ आसन ऐसे हैं- जैसे चंद्रासन, सूर्यनमस्कार, कल्याण आसन आदि। इन्हें अन्य आसनों के अंतर्गत रखा गया है।
किसी भी तरह का yoga asanas करने से पहले सावधानियां रखना अतिआवश्यक होता है। yoga asanas प्रभावकारी तथा लाभदायक तभी हो सकते हैं, जबकि उसको उचित रीति से किया जाए। इन yoga asanas को किसी योग्य योग चिकित्सक की देख-रेख में सीख कर करें तो ज्यादा अच्छा होगा।

अगर सही तरीके से yoga asanas को किया जाए तो वो बेहद लाभप्रद साबित होते हैं। कुछ लाभ की हम यहाँ बात करते हैं।

1. yoga asanas का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे सहज साध्य और सर्वसुलभ हैं। yoga asanas ऐसी व्यायाम पद्धति है जिसमें न तो कुछ विशेष व्यय होता है और न इतनी साधन-सामग्री की आवश्यकता होती है।
2. आसनों में जहां मांसपेशियों को तानने, सिकोड़ने और ऐंठने वाली क्रियायें करनी पड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर साथ-साथ तनाव-खिंचाव दूर करनेवाली क्रियायें भी होती रहती हैं, जिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापिस मिल जाती है। शरीर और मन को तरोताजा करने, उनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी yoga asanas का अपना अलग महत्त्व है।
3. Yoga asanas से भीतरी ग्रंथियां अपना काम अच्छी तरह कर सकती हैं और युवावस्था बनाए रखने एवं वीर्य रक्षा में सहायक होती है।
4. Yoga asanas द्वारा पेट की भली-भांति सुचारु रूप से सफाई होती है और पाचन अंग पुष्ट होते हैं। पाचन-संस्थान में गड़बड़ियां उत्पन्न नहीं होतीं।
– yogaasanas मेरुदण्ड-रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और व्यय हुई नाड़ी शक्ति की पूर्ति करते हैं।
– yogaasanas पेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं। इससे मोटापा घटता है और दुर्बल-पतला व्यक्ति तंदरुस्त होता है।
– yogaasanas स्त्रियों की शरीर रचना के लिए विशेष अनुकूल हैं। वे उनमें सुन्दरता, सम्यक-विकास, सुघड़ता और गति, सौन्दर्य आदि के गुण उत्पन्न करते हैं।
–  yogaasanas श्वास- क्रिया का नियमन करते हैं, हृदय और फेफड़ों को बल देते हैं, रक्त को शुद्ध करते हैं और मन में स्थिरता पैदा कर संकल्प शक्ति को बढ़ाते हैं।
– yogaasanas शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता है और वह अपने कार्य सुचारु रूप से करते हैं।
– yogaasanas से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है, जिससे शरीर पुष्ट, स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है। आसन शरीर के पांच मुख्यांगों, स्नायु तंत्र, रक्ताभिगमन तंत्र, श्वासोच्छवास तंत्र की क्रियाओं का व्यवस्थित रूप से संचालन करते हैं जिससे शरीर पूर्णत: स्वस्थ बना रहता है और कोई रोग नहीं होने पाता।
जहाँ एक ओर अन्य excercises पद्धतियां केवल बाह्य शरीर को ही प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं, वहीं   yoga asana मानव का चहुँमुखी विकास करते हैं।
यद्यपि योग की उत्पत्ति हमारे देश में हुई है, किंतु आधुनिक समय में इसका प्रचार-प्रसार विदेशियों ने किया है, इसलिए पाश्चात्य सभ्यता की नकल करने वाले ‘योग’ शब्द को ‘योगा’ (yoga)बोलने में गौरवान्वित महसूस करते हैं। लेकिन आज स्वामी रामदेव जैसे योग गुरु की वजह से योग (yoga) को फिर से भारत में एक नई पहचान मिली है और एक बार फिर भारत देश योग (yoga) को अपनाने लगा है।
आपको हमारा ये ब्लॉग कैसा लगा जरूर बताएं। साथ ही इससे जुड़ी और जानकारी या सुझाव हो तो हमसे share करें।

About the author

Nisha Shekhawat Adhikari

B.sc.(math)
MBA( HR & marketing)
She has participated in various functions as a speaker.
Content or blog writer by passion. She had written few blogs in DNA newspaper Jaipur and Some articles for college magazines.

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