Motivation

क्या कारन है कि हम अपनों पर भी चिल्लाते हैं?

क्या कारन है कि हम अपनों पर भी चिल्लाते हैं




जब इंसान गुस्से में होता है तो अपनों से भी चीख कर, चिल्ला कर बात करता है। लेकिन जब आप किसी से प्रेम करते हो लेकिन फिर भी गुस्से में उससे चिल्ला कर बात करते हो तो इसका क्या कारण है?

जहाँ प्रेम होता है प्रीत होती है वहाँ तो धीमे से बात की जाती है। फिर क्रोध में ऐसा क्या हो जाता है कि अतिप्रिय से भी हम बेहूदगी से बात करने पे उतर आते हैं। इसका कारन है दिलों में दूरियां। जी हाँ जब दिलों में दूरियां पैदा हो जाती हैं तभी गुस्सा भी आता है और बात करने का लहजा भी बदल जाता है। वरना जिसे आप प्रेम करते हो या जो आपके करीबी हैं उनसे इस तरह चिल्ला के बात करना तो अजीब ही प्रतीत होता है, फिर ये कह देना कि  गुस्से में निकल गया तो ये गुस्सा भी तो दूरियां ही दर्शा रहा है। जब दिल में दूरियां हों तो गुस्से, नफरत जैसी भावनाएं जन्म लेती हैं, दिल मिलें हो वहां तो नफरत भी प्यार में बदल जाती है।




तो जब भी क्रोध, असंवेदनशील या कठोरता का समावेश होता है वहाँ दिलों में फासले पैदा हो चुके होते हैं।हालाँकि ये फासले अपनों के साथ हो तो कभी कभी समय के साथ साथ कम भी हो जाते हैं लेकिन कही गई कड़वी बातें दिल में छाप छोड़ ही जाती हैं। इसका नतीजा ये होता है कि फिर स कोई छोटी सी भी प्रतिकूल परिस्थिति आती है तो फिर से वही रवैया दोहराया जाता है और एक बार फिर क्रोध का बहाना लगा कर आप दिलों में आयी दूरियों को नहीं दिखाने की नाकाम कोशिश में लग जाते हैं।

ऐसा आप कुछ समय ही कर सकते हैं क्योंकि जहाँ प्रेम दिल से नहीं दिखावे के लिए किया जाता है वहाँ दरारें बढ़ती बढ़ती गहरी खाई बन ही जाती हैं। तो सार ये है कि जहाँ दिल मिले हैं वहाँ बातें भी धीरे धीरे और प्रेम से ही होती हैं और जहाँ पैदा हो चुके हैं फासले वहाँ चीखना चिल्लाना ही शेष रह जाता है।

About the author

Nisha Shekhawat Adhikari

B.sc.(math)
MBA( HR & marketing)
She has participated in various functions as a speaker.
Content or blog writer by passion. She had written few blogs in DNA newspaper Jaipur and Some articles for college magazines.

Leave a Comment